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श्रीकृष्ण अपने शंख, चक्र, गदा धारण किए अपने सौम्य रूप में प्रकट हुए और मयूरध्वज से वरदान मांगने को कहा. मयूरध्वज ने कहा- प्रभु, अर्जुन जैसे योद्धा को आपके अनन्य भक्त मेरे बालक ने परास्त कर दिया. उनकी लाज रखने स्वयं आप पधारे और फिर मुझे आपके दर्शन मिले.
अब संसार में भला ऐसी कौन सी बहुमूल्य वस्तु रह गई है जिसकी मैं कामना करूं.
अर्जुन को समझ में आ गया कि श्रीकृष्ण ने यह लीला क्यों रची. वह प्रभु के चरणों में गिर पड़े और भूल के लिए क्षमा मांगी.
वृंदावन विहारी लाल की जय
(जैमिनीय अश्वमेध पर्व की कहानी)
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