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महादेव ने समझाया कि हम तो ठहरे योगी, महल में तो चैन ही नहीं पड़ेगा. महल में रहने के बड़े नियम-विधान होते हैं. मस्तमौला औघड़ों के लिए महल उचित नहीं है. देवताओं को भी यह विचित्र लगेगा. हमें उनके साथ स्पर्धा नहीं करनी चाहिए. मेरे पास तो ऋषि-मुनियों का आना-जाना रहता है. वे कहीं महल देखकर संकोच न करें.
हमारे अनुचर गण भी आपने देखे ही हैं. उन्हें महल में रहने का तरीका कौन सिखाएगा. देवी आपको जरा भी आभास नहीं कि महल में रहने के कारण कितनी परेशानी खड़ी होगी. यदि हम महल में सही तरीके से न रह पाए तो फिर आपकी हंसी हो जाएगी. लोग कहेंगे देखा-देखी में महल तो बनवा लिया पर रहना न आया.
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भोलेनाथ अपनी ही लीला के फेर में फंस चुके थे. सो बाहर निकलने के लिए तरह-तरह से समझा रहे थे. परंतु देवी का वह तर्क अपनी जगह पर कायम था कि देव यदि महल में रहते हैं तो महादेव क्यों श्मशान में और बर्फ की चट्टानों पर?
महादेव को झुकना पड़ा. उन्होंने उन्होंने विश्वकर्मा जी को बुलाया. उन्हें ऐसा महल बनाने को कहा जिसका सुंदरता की बराबरी का महल त्रिभुवन में कहीं न हो. वह न तो धरती पर हो न ही जल में.
विश्वकर्मा जी जगह की खोज करने लगे. उन्हें एक ऐसी जगह दिखी जो चारों ओर से पानी से ढकी हुई थी बीच में तीन सुन्दर पहाड़ दिख रहे थे. उस पहाड़ पर तरह-तरह के फूल और वनस्पति थे.
विश्वकर्माजी ने माता पार्वती को उसके बारे में बताया तो माता प्रसन्न हो गईं.
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विश्वकर्माजी को एक विशाल नगर के ही निर्माण का आदेश दे दिया. विश्वकर्माजी ने अपनी कला का परिचय देते हुए वहां सोने की अद्भुत नगरी ही बना दी. नगरी बनकर तैयार हुई तो पार्वतीजी उसे देखने गईं. वह उनके आशा के अनुरूप था. उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई. उन्होंने दिमाग में सारी व्यवस्था बनी ली. कौन कहां रहेगा. कहां अतिथि रहेंगे. कहां पर भोजनालय होगा. कहां पर विश्रामघर.
सारी योजना माता ने बना ली. वह अत्यंत प्रसन्न थीं और शीघ्रातिशीघ्र इसमें आकर रहना चाहती थीं.
माता ने गृहप्रवेश का मुहूर्त निकलवाया. विश्रवा ऋषि को गृहप्रवेश के लिए आचार्य नियुक्त किया गया. सभी देवताओं और ऋषियों को निमंत्रण मिला. जिसने भी महल देखा वह उसकी प्रशंसा करते नहीं थका.
शिवजी तो फंस गए थे. इससे निकलना भी जरूरी था. शिवजी ने फिर से एक लीला की. गृह प्रवेश कराने के बाद महादेव ने आचार्य से दक्षिणा मांगने को कहा.
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महादेव की माया से विश्रवा का मन उस नगरी पर ललच गया था. उन्होंने महादेव-पार्वती से पूछा कि क्या जो मांगा जाए वह मिल जाएगा.
माता ने कहा- संसार में ऐसा क्या है जो देवाधिदेव महादेव न दे सकें. ऋषिवर आपको भ्रम क्यों हो हो रहा है. आप मांगे. महादेव से पहले मैं वचन देती हूं कि मांगते ही आपको मनचाही वस्तु मिल जाएगी.
विश्रवा ने दोनों से दान का संकल्प कराया और दक्षिणा के रूप में लंका नगरी ही मांग ली.
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Ram Ram
Jai Bholenath