सोने की लंका नगरी क्यों जली? पार्वतीजी का एक शाप विश्रवा का पीछा कर रहा था. उसी शाप के कारण विश्ववा का कुल नष्ट हुआ. सोने की लंका भी जली.
लंका नगरी रावण के लिए बनाई ही नहीं गई थी. वह तो पार्वतीजी ने अपने लिए बनवाई थी. पार्वतीजी ने भी अपने लिए कहां बनवाई थी. वह तो महादेव अपनी ही रची लीला में फंस गए थे. जिसका परिणाम हुआ कि लंकानगरी बनी, फिर जली. बड़ी सुंदर कथा है- आनंद लीजिए.
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एक बार की बात है. नारायण के मन में शिवजी के दर्शन की प्रेरणा हुई. वह शिवजी से मिलने कैलाश चलने को तैयार हुआ. माता लक्ष्मी ने कहा कि मैं भी साथ चलूंगी. लक्ष्मी-नारायण गरूड़ पर सवार होकर कैलाश में शिव और जगदंबा से मिलने आए. शिवजी तो हिमशिला पर बैठे ध्यान मग्न थे. शरीर पर एक व्यााघ्रचर्म था जिसे एक नाग ने कसके उनकी कमर से लपेट रखा था.
श्रीविष्णुजी और लक्ष्मीजी को देखकर उनका स्वागत करने को शिव-पार्वती आए. गरूड़ को देखकर शिवजी के कमर में बंधे नाग को भय हुआ. वह थोड़ा विचलित हुआ तो शिवजी का वस्त्र सरकने लगा. पार्वतीजी को इससे संकोच हुआ. नारायण विविध वस्त्रों में सुशोभित आए थे. लक्ष्मी तो लक्ष्मी ही हैं. समस्त आभूषणों से उनकी आभा निखर रही थी.
पार्वतीजी ने सोचा मेरे पति तो देवों के देव हैं पर इस रूप में कोई देखे तो क्या मानेगा ऐसा. शिवजी की लीला से वह मोहित हो गईं और उनमें सहज नारी भाव आने लगे. कैलाश पर हिम ही हिम और शिव-पार्वती तो एक गुफा में रहते थे. सर्दी से लक्ष्मीजी को थोड़ी परेशानी हुई.
उन्होंने पार्वतीजी से पूछ लिया- आप तो पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं. आप राजकुमारी हैं. संसार का कौन सा ऐश्वर्य आपके लिए सुलभ नहीं. आप एक सुंदर सा भवन क्यों नहीं बनवा लेतीं. गुफाओं में रहना आपके लिए उचित नहीं है. आप भी स्वर्ण के आभूषण आदि से शृंगार किया करें. पति को शृंगार से रिझाना पत्नी का कर्तव्य है.
कुशल गृहणी के दायित्व हैं ये सब. आप इस पर थोड़ा ध्यान दीजिए. आप बैकुण्ठ धाम आइए. वहां मैं आपको अपने द्वारा बनाई व्यवस्था दिखाकर इसे और अच्छे से समझाऊंगी.
शिवजी की लीला से दोनों देवियां सामान्य स्त्रियों जैसा आचरण, वार्तालाप कर रही थीं. पार्वतीजी एक तो शिवजी के वस्त्र के सरकने से थोड़ी असहज थीं. ऊपर से लक्ष्मीजी ने इतना कुछ कहा तो वह मन ही मन दुखी हो गईं.
कुछ दिनों बाद पार्वतीजी ने शिवजी से कहा कि बैकुण्ठधाम चलना है. वह लक्ष्मीजी द्वारा बनाई व्यवस्था को देखना चाहती थीं. उससे बेहतर व्यवस्था बनाना चाहती थीं. दोनों बैकुंठ पहुंचे. वहां पार्वतीजी ने लक्ष्मीजी द्वारा रचित वैभव को देखा तो चकित हो गईं. सारा बैकुंठ धाम स्वर्ण के प्रकाश से चमचमा रहा था. सेवक भी स्वर्ण आभूषणों से लदे-पड़े थे. स्वर्ण और बहुमूल्य रत्न से ही सारा लोक सजा था.
स्वर्ण का वैभव पार्वतीजी को भा गया. लक्ष्मीजी ने उन्हें पूरे लोक की व्यवस्था दिखाई और संकेत में कह भी दिया कि आप कुशल गृहणी नहीं हैं.
अब तो पार्वतीजी ने ठान लिया कि वैभव में वह लक्ष्मीजी से भी श्रेष्ठ लोक बनाएंगी. शिवजी तो अपनी ही लीला में फंस गए. पार्वती शिवजी से हठ करने लगीं. आप तो देवों के भी देव हैं. सारे देव तो सुंदर महलों में रहते हैं लेकिन देवाधिदेव श्मशान में या पर्वत पर. इससे तो देवों की प्रतिष्ठा भी बिगड़ती है. कोई अतिथि आता है तो उसे यही लगता है कि मेरी कुशलता में कमी है. अब बहुत हो चुका. मैं इस व्यवस्था से तंग आ चुकी हूं.
पार्वतीजी ने साफ-साफ कह दिया कि अब यह सब चलेगा नहीं. आपको भी महल में रहना चाहिए. आपका महल तो इंद्र के महल से भी उत्तम और भव्य होना चाहिए. ऐसा महल बनवाकर दीजिए जो तीनों लोक में कहीं न हो. यदि यह नहीं करते तो फिर बातचीत बंद रहेगी. मैं अब महल में ही रहूंगी. महल भी साधारण नहीं, बैकुंठ से भी सुंदर.
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