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कृष्णा ने अधिकारपूर्वक गोपाल भैया से कहा कि वो उसे जंगल पार करा दें क्योंकि उसे डर लग रहा है. गोपाल हंसे. उनकी हंसी से पूरा जंगल जैसे किसी अलौकिक रोशनी से जगमगा उठा.

वह बोले- छोटे भैया, मैं आ गया हूं. तुम्हें किसी से डरने की जरूरत नहीं. उन्होंने कृष्णा को जंगल पार कराया.

कृष्णा ने कहा- आप मेरे बड़े भैया हैं. छोटे भाई की सहायता को शाम को भी आ जाना बिना पुकारे. आप मुझसे प्रेम करते हो तो जरूर आओगे.

लीलाधारी ने चिरपरिचित मुस्कान बिखेरी. उनके मुस्कुराने से जंगल में मंगल हो गया फिर वह बोले- कृष्णा तुम अपने सारे भय त्याग दो, आज से मैं तुम्हारे साथ हूं. सदैव तुम्हारे साथ हूं.

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कृष्णा खुशी-खुशी विद्यालय चला गया. दिनभर पढ़ाई की लौटकर देखा तो जंगल के मुहाने पर गोपाल भैया खड़े थे. उनके साथ बहुत सारी गैया और बछड़े भी थे. बालक कृष्णा अपनी सारी थकान भूल गया और दौड़कर भगवान के पास पहुंच गया.

गोपाल भैया मुरली बजाते हुए उसे जंगल के दूसरे मुहाने तक छोड़ आए. रास्ते में गोपाल भैया ने उसे पीने के लिए गाय का ताजा दूध भी दिया.

उधर दादी दिनभर बेचैन कृष्णा की चिंता कर रही थी. शाम को उन्होंने कृष्णा को आते देखा, तो जान में जान आई. उन्होंने पूछा कि आखिर तुम्हें जंगल में डर तो नहीं लगा कृष्णा?

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कृष्णा ने सारी कहानी बताई. दादी को लगा किसी चरवाहे ने कृष्णा को जंगल पार करा दिया होगा. वह तो सोच भी नहीं सकती थी स्वयं लीलाधारी भगवान श्रीकृष्ण ही प्रकट हो गए थे.

यह रोज का नियम हो गया. कृष्णा को गोपाल भैया विद्यालय से घर और घर से विद्यालय छोड़ा करते थे.

एक बार विद्यालय में गुरुजी का जन्मोत्सव मनाया जा रहा था.

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