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दरबारियों ने कहा कि महाराज आज से यह नियम ख़त्म हो गया क्योंकि हमें अब एक अक़लमंद राजा मिल गया है. वहां तो हम उन बेवक़ूफ राजाओं को छोड़कर आते थे जो एक साल की राजशाही के मज़े में बाक़ी की ज़िंदगी को भूल जाते.
राजमहल की जिंदगी के बाद के जीवन के लिए कोई बंदोबस्त नहीं करते थे जबकि उन्हें पता था कि उनको सालभर बाद यह सब छोड़ना होगा. लेकिन आपने दिमाग का इस्तेमाल किया और आगे का बंदोबस्त कर लिया. हमें ऐसे ही होशियार राजा की खोज थी.
जीवनचक्र भी ऐसा ही है. जो आता है वह जानता है कि उसे चले जाना है. जो सिर्फ इस लोक के ऐश्वर्य में फंसे रहते हैं उनकी गति बाकी राजाओं सी होती है. जो इस लोक औऱ परलोक दोनों की सोचते हैं वे संकट से निकल जाते हैं.
इस लोक के सुख को अपनी जरूरत से प्राप्त करने में तो जुटे ही रहते हैं. परलोक सुधारना है तो नेक कर्म करिए. अपने सारे कर्म ईश्वर को समर्पित करें. जमा-खाता रखिए और स्मरण करते रहिए कि आपके नेक कर्म ज्यादा जमा हुए हैं या बुरे कर्म क्योंकि गति उसके अनुरूप ही होगी.
संकलनः रामकुमार ओझा
संपादनः प्रभु शरणम्
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