जीवन का मौज लेना हर कोई चाहता है लेकिन ले पाता कोई-कोई ही है. जीवन का आनंद है क्या और कैसे जीवन को मौज में बिताया जा सकता है. जीवन का आनंद लेना एक कला है. इसे सीखने और फिर साधने की जरूरत होती है.
प्रभु शरणम् में चल रही जीवन का आनंद शृंखला में चर्चा को आगे बढ़ाते हैं. जीवन से जो आनंद निकल गया क्या उसे वापस नहीं पाया जा सकता? क्या यह इतना मुश्किल है या हम उसे पाने के प्रयास से हिचक रहे हैं. एक छोटी सी कथा शायद आपके मन को झकझोर दे. जीवन का आनंद वापस प्राप्त करने की तलब जगा दे.
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नागा संन्यासियों के बारे में आपने सुना होगा. साथ में कोई बोझ लेकर नहीं चलते, यहां तक कि कपड़े भी नहीं. मस्त मलंग फिरते हैं. एक नागा संन्यासी बड़े मौज में कहीं घूम रहे थे. उन्हें कौन देख रहा है, क्या सोच रहा है, क्या नहीं इन सब बातों से बेपरवाह. जीवन के संर्घषों में पिसा एक युवक वहीं खड़ा था. उसने किसी को ऐसे बेपरवाह देखा तो उसे बड़ा कौतूहल हुआ.
आज के जमाने में कोई इतना बेफिक्र, मतना मस्तमौला भी हो सकता है. इस बंदे को तो कोई परवाह ही नहीं, कोई चाह ही नहीं. जिन संन्यासी को देखकर कुछ समय पूर्व वह उपहास करना चाहता था, अब उनसे जलन हो रही थी. ऐसा कैसे संभव है! क्यों न इन्हीं से पूछा जाए इनकी खुशी का राज.
युवक पहुंचा नागा संन्यासी के पास. प्रणाम करके अपना सवाल दाग दिया.
युवक ने पूछा- बाबा आपके पास तो कपड़े तक नहीं, घर-बार नहीं, कुटुंब-रिश्तेदार नहीं. फिर भी जीवन में इतना आनंद क्यों है? मेरे पास तो सबकुछ है फिर भी मेरे जीवन में आनंद क्यों नहीं है?
संन्यासी ने कहा- बेटा मैं हमेशा आनंदित रहने के भाव में रहता हूं, तुम असंतुष्ट रहने के भाव में इसलिए मैं मौज में जीता हूं तुम कोफ्त में.
व्यक्ति बोला- बाबा यह सब कह देना बड़ा आसान है जबकि सच्चाई जीवन की कुछ और है. इतनी तरह की मुश्किलें हैं, इतने तरह की मारामारी कि कोई इंसान मौज में रह ही नहीं सकता. आप मौज में हैं क्योंकि आप इस समाज से भाग गए हैं. समाज में रहते हुए मौज में रहने का कोई नुस्खा बता सकें तो बड़ी कृपा होगी.
संन्यासी ने कहा- बेटा सबसे पहली बात कि तेरी यह सोच ही गलत है कि संन्यासी किसी भी समाज के अंग नहीं हैं. संन्यासियों का भी समाज है. वह भी आम मनुष्यों से मिलकर बना है. जब कोई नया संन्यासी बनता है तो वह भी हर आम नागरिक जैसा होता है. संन्यासियों में भी विकार है, पर उनमें से जो मौज लेना सीख गया वह सीख गया.
रही बात नुस्खे की तो वह तो मैं नहीं जानता पर प्रकृति के उदाहरणों से ही मैं जीवन के रहस्य समझता हूं. ये झाड़ियां देख रहे हो. बड़ी झाड़ी, छोटी झाड़ी सब साथ में हैं. पर मैंने कभी इन दोनों को परेशान नहीं देखा कि मैं छोटा हूं, तुम बड़े क्यों हो.
मैंने इसी स्थान पर संन्यास का आधे से अधिक जीवन बिता दिया पर इन झाड़ियों के बीच कोई विवाद नहीं सुना. न छोटी झाड़ी कभी इस होड़ में पड़ी कि उसे भी बडा हो जाना है और न बड़ी झाड़ी ने कभी छोटी झाड़ी के आकार की खिल्ली उड़ाई.
छोटा अपने छोटे होने में खुश है, बड़ा अपने बड़े होने में खुश है क्योंकि इनमें तुलना की भावना ने प्रवेश ही नहीं किया है. ये हर बात पर तोल-मोल नहीं करते. घास का एक पत्ता भी उसी आनंद से डोलता है हवा में जिस आनंद से कोई देवदार का बड़ा वृक्ष डोलता है.
घास का फूल भी उसी आनंद से खिलता है, जिस आनंद से गुलाब का फूल खिलता है. कोई भेद नहीं है. भेद की दृष्टि तो तुम्हारी है. तुम कहोगे, यह घास का फूल है और यह गुलाब का फूल. परंतु घास और गुलाब के फूल के लिए कोई आपसी तुलना है ही नहीं. दोनों अपने आनंद में मग्न हैं.
जो तुलना छोड़ देता है, वह मग्न हो जाता है. जो मग्न हो जाता है उसकी तुलना छूट जाती है. वह अतुलनीय हो जाता है.
जीवन का आनंद पाना चाहते हो तो कुछ समय के लिए खुद को संसार की स्पर्धा से मुक्त करके देख लो. किसी को दबाने-पछाड़ने की भावना छोड़ दो, किसी की विशेष सफलता को देखकर ललचना छोड़ दो. कुछ समय के लिए करके तो देखो.
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क्या तुम्हारी दृष्टि संकीर्ण हो चुकी है कि कुछ दिनों के लिए भी इसे आजमा कर नहीं देख सकते.
क्या एक महीने के लिए भी ट्रायल के लिए यह भाव हम अपने अंदर नहीं ला सकते कि फिलहाल जो प्राप्त है वह पर्याप्त है. यदि सचमुच ऐसा है तो फिर आप इस धरती पर असंतुष्ट रहने के लिए ही भेजे गए हैं. असंतुष्ट व्यक्ति की उपयोगिता ही क्या है, फिर गोबर में घी क्यों सुखाना !
गोबर भी व्यर्थ नहीं होता. किसी न किसी काम आता ही है. पूजन में गणेश की तरह पंचामृत प्रसाद पाता है या फिर सूखकर कंडे के रूप में हवन की अग्नि में जल जाता है. हिम्मत हारने की बात ही नहीं है, मजा तो रास्ता तलाशने में है. धर्म-आध्यात्म इसमें सहयोग करते हैं.
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धार्मिक अभियान प्रभु शरणम् के बारे में दो शब्दः
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