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जब मंदिर पूरी तरह बनकर तैयार हो गया तब संतजी ने तीनों को अपने पास बुलाया. उन्होंने पहले शिष्य से पूछा- जब मंदिर बन रहा था, तब तुम्हें कैसा अनुभव हो रहा था?
शिष्य ने उत्तर दिया- गुरुदेव! मुझे पूरे दिन काम करना पड़ता था. लगता था कि मुझमें और एक गधे में कोई अंतर ही नहीं रह गया है. मंदिर के निर्माण का कार्य करते-करते मैं तो परेशान हो गया था.
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