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सुदेहा ने पति के सामने संकल्प लिया कि वह कभी भी अपनी बहन से ईर्ष्या नहीं करेगी. हारकर सुधर्मा ने घुश्मा से विवाह कर लिया. विवाह के बाद घुश्मा अपनी बड़ी बहन की सेवा करती थी. सुदेहा भी उससे खूब प्यार करती थी.

अपनी बहन की शिवभक्ति से प्रभावित होकर घुश्मा भी शिव आराधना करने लगी. वह प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग (मिट्टी के शिवलिंग) बनाकर पूजा करती थी.

पूजा के बाद उन शिवलिंगों को समीप के तालाब में विसर्जित कर देती थी. भगवान शिव की कृपा से घुश्मा को एक सुन्दर पुत्र हुआ. घर में बालक आने से प्रसन्नता का माहौल हुआ.

सुदेहा भी पुत्र के आने से प्रसन्न थी लेकिन जल्द ही उसे यह लगने लगा कि परिवार में अब घुश्मा का मान बढ़ गया है. पति उससे और उसके पुत्र से ज्यादा स्नेह रखते हैं. सुदेहा को ईर्ष्या हुई.

समय के साथ घुश्मा का पुत्र बड़ा हो गया तो विवाह कर दिया गया. पुत्रवधू भी घर में आ गई. यह सब देखकर सुदेहा की ईर्ष्या पहले से भी ज्यादा बढ़ गई और उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई.

उसने घुश्मा का अनिष्ट करने की ठान ली. एक दिन रात्रि में उसने सोते समय घुश्मा के पुत्र के शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर शव को उसी सरोवर में डाल दिया, जहां घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग का विसर्जन करती थी.

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