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वीरवाहन वशिष्ठ को प्रणामकर उनके पास बैठ गया. वशिष्ठ ने राजा के आने का प्रयोजन पूछा. राजा ने कहा- महर्षि मैं इस चिंता में रहता हूं कि मुझसे अनजाने में भी कोई पाप या धर्मविरुद्ध कार्य न हो जाए.
मैं यथाशक्ति धार्मिक कार्य करता रहता हूं पर मुझे यमराज और उनके दूतों से बहुत भय लगता है कि कहीं मुझे अनजाने में हुए किसी पाप के चलते नरक न देखना पड़े. कोई ऐसी युक्ति बताएं जिससे मैं भयमुकत हो जाऊं.
वशिष्ठजी बोले- सद्गति के लिए गया तीर्थ में पितरों का श्राद्ध करने, दूसरे उपाय करने के बावजूद जो वृषोत्सर्ग यानी वृष दान नहीं करते उनके कार्य निष्फल रहते हैं. वृषोत्सर्ग से ब्रह्महत्या तक के पाप धुल जाते हैं. इसलिए विधिवत वृषोत्सर्ग करना चाहिए.
ब्राह्मण को श्वेत वृषभ अथवा सांड का, क्षत्रिय को भूरा लाल और वैश्य को पीला तथा काला सांड शूद्र के वृषोत्सर्ग के लिए उत्तम है. किस प्रकार के वर्ण और किस तरह के वृष का उत्सर्ग उत्तम रहेगा यह जानकर ही वृषोत्सर्ग करना चाहिए. इनमें नीला वृष सर्वोत्तम है.
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