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तव चेन्मातः स्रोतः स्नातः पुनरपि जठरे सोपि न जातः ।नरकनिवारिणि जाह्नवि गंगे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुंगे। ॥ 7 ॥
(हे मां! आपके जल में स्नान करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता। हे जाह्नवी! आपकी महिमा अपार है। आप अपने भक्तों के समस्त कलुषों को विनष्ट कर देती हो और उनकी नरक से रक्षा करती हो।)
पुनरसदंगे पुण्यतरंगे जय जय जाह्नवि करुणापांगे ।इंद्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ 8 ॥
(हे जाह्नवी! आप करुणा से परिपूर्ण हो। आप अपने दिव्य जल से अपने भक्तों को विशुद्ध कर देती हो। आपके चरण देवराज इंद्र के मुकुट के मणियों से सुशोभित हैं। शरण में आने वाले को आप सुख और शुभता प्रदान करती हो।)
रोंगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम् ।त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ॥ 9 ॥
(हे भगवती! मेरे समस्त रोग, शोक, ताप, पाप और कुमति को हर लो आप त्रिभुवन का सार हो और वसुधा का हार हो, हे देवी! इस समस्त संसार में मुझे केवल आपका ही आश्रय है।)
अलकानंदे परमानंदे कुरु करुणामयि कातरवंद्ये।तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुंठे तस्य निवासः॥10॥
(हे गंगे! प्रसन्नता चाहने वाले आपकी वंदना करते हैं। हे अलकापुरी के लिए आनंद-स्रोत हे परमानंद स्वरूपिणी! आपके तट पर निवास करने वाले वैकुंठ में निवास करने वालों की तरह ही सम्मानित हैं।)
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