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कुछ मंत्र पढ़ते हुए आ गए वापस अपने स्थान पर और जुट गए तैयारियों में। अपनी साधनास्थली वाले श्मशान में उस रात अकेले ही पहुंचे वो। आसन लगाया और इक्कीस कपाल सजाये और कर दिया आह्वान। तेज हवा चलने लगी, पेड़ झुक गए, मिट्टी उड़ने लगी।
महातांत्रिक को उनके खबरियों ने सूचना दी। जिसे सुनकर उन्होंने अट्ठहास किया। तभी वे दोनों ब्रह्मराक्षस प्रकट हो गए। तमतमाता चेहरा लिए।
ब्रह्मराक्षसों ने कहा- हमारे स्थान को अपवित्र करने के लिए माफी मांग और हमारा भोग दे। वरना तेरा भी सर्वनाश कर देंगे।
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महातांत्रिक को भी क्रोध आया, उऩ्होंने अपना औघड़ी रुप दिखाया। उनका तो उद्देश्य ही उन दोनों को सबक सिखाना था, फिर क्षमा कैसे मांगते।
उन्होंने और कह दिया कि ये जानते हुए कि तुम दोनो वहां निवास करते हो। फिर उन्होंने वहां मूत्र-त्याग किया और बोले तुमसे जो बन पड़े कर लो।
युद्ध शुरु हुआ, जो चला चौदह रात्रि तक। चौदह रात्रि तक महातांत्रिक से उन दोनों ब्रह्मराक्षसों का महासंग्राम हुआ। मजे की बात यह कि सूर्योदय के साथ ही विश्राम हो जाता और सूर्यास्त होते ही युद्ध की घोषणा। काली शक्तियां रात में ही प्रभावी होती हैं। ब्रह्मराक्षस रात्रि में आ जाते युद्ध को।
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