हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:fb]
नियम बना कि जो टोली हारेगी वह विजेता टोली के एक सदस्य को पीठ पर बिठाकर उसके पसंद के स्थान तक लेकर जाएगी. एक दल के नेता बने श्रीकृष्ण और दूसरे दल के नेता बने बलरामजी.

टोली बंटी तो प्रलंबासुर श्रीकृष्ण की मंडली में आ गया. श्रीकृष्ण ने उस पर निगाहें बना रखी थीं कहीं वह किसी ग्वालबाल का अहित न करें किंतु उन्होंने यह प्रकट भी न होने दिया. उसके साथ मित्रवत ढंग से रहे.

एक बार बलरामजी की टोली जीत गई और श्रीकृष्ण की टोली बार गई. हारी हुई टोली के लोग घोड़ा बने और विजेता टीम ने सवारी की. श्रीकृष्ण ने अपनी पीठ पर सुदामा को बिठाया, मद्रसेन ने वृषम और बलराम ने प्रलंबासुर को.

वास्तव में, प्रलंबासुर श्रीकृष्ण की शक्ति को देख समझ गया था. उसे आभास हो गया था कि श्रीकृष्ण का वह अहित नहीं कर पाएगा इसलिए क्यों न बलराम का ही वध करके श्रीकृष्ण को पहले पीड़ित किया जाए. बाद में कृष्णवध की योजना बनेगी.

उसने बलराम को अपनी सवारी का आमंत्रण दिया. श्रीकृष्ण ने अपने बड़े भाई को संकेत से समझा दिया. प्रलंबासुर घोड़ा बना और बलराम उसकी पीठ पर बैठ गए. उसके दिमाग में बलराम के अपहरण की योजना चल रही थी.

शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here