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चुनौती देने वाले के रूप में एक बालक को देखा तो उसे क्रोध और आश्चर्य दोनों हुआ. उसने श्री कृ्ष्ण को मर्मस्थानों में डंसकर अपने शरीर के बन्धन से उन्हें जकड़ लिया. भगवान् श्रीकृष्ण नागपाश में बंधकर बेहोश हो गए.

यह देखकर साथी ग्वालबाल बहुत दुखई हुए और दु:ख, पश्चाताप और भय से हताश होकर पृथ्वी पर गिर पड़े. गाय, बैल, बछिया और बछड़े बड़े दु:ख से डकराने लगे. श्रीकृष्ण की ओर ही उनकी टकटकी बंध रही थी.

कुछ तट पर खड़े रहे, कुछ ग्वालबाल गांव की ओर दौड़ पड़े. नंदबाबा को बुलाओ, बलराम को बुलाओ की पुकार मचने लगी. समाचार मिलते ही व्रजवासी भी यमुना तट पर दौड़ आए. कान्हा को कालिया नाग के चंगुल में देख उनके प्राण सूख गए.

नंदबाबा के साथ माता यशोदा भी आईँ. अपने पुत्र को साक्षात काल जैसे कालिया नाग के चंगुल में देखा तो उनसे रहा न गया. वह जोर-जोर से विलाप करती नदी में कूदने भागीं लेकिन गोपियों ने उन्हें बलपूर्वक पकड लिया.

भगवान ने देखा कि पूरा व्रजलोक विलाप कर रहा है तो उन्होंने अपना शरीर खूब फुलाना शुरू किया. उसके दबाव में कालिया ने उन्हें अपने पाश से मुक्त कर दिया. कालिया का शरीर दर्द से टूटने लगा.

उसके एक सौ एक सिर थे. उसने अपना फन काढ़ा और फुंफकार कर विष वर्षा करने लगा. वह श्रीकृष्ण पर पैंतरे बदल-बदलकर आघात करता. कन्हैया उछलकर निकल जाते. प्रभु के लिए ठिठोली थी लेकिन कालिया के लिए दर्द असह्य हो गया.

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