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असुरों ने कई बार कच के प्राण लिए पर देवयानी बार-बार अपने पिता से जिद करके कच को जीवित करा लेती थी. बार-बार विफल रहने से असुर परेशान हो गए.

असुरों ने इस समस्या से छुटकारे के लिए बुद्धि लगाई. उन्होंने कच को मारकर उसे भोजन के रूप में शुक्राचार्य को खिला दिया. देवयानी को इसकी सूचना हो गई.

अब कच शुक्राचार्य के शरीर के भीतर पहुंच गया था. शुक्राचार्य भी बार-बार उसे जीवित करके परेशान थे. वह जानते थे कि कच मृत संजीवनी विद्या सीखने के लिए इतने बार प्राण पर खेल रहा है.

पुत्री के प्रेम और शिष्य के हठ को देख शुक्राचार्य को कच पर दया आ गई. उन्होंने कच को संजीवनी विद्या सीखा दी. कच विद्या प्रयोगकर जीवित हुआ और शुक्राचार्य का पेट चीरकर निकला.

शिक्षा पूरीकर कच ने गुरु से विदाई ली. कच देवयानी से भी मिलने गया. देवयानी कच से विछोह की बात सोचकर व्याकुल हो गई. उसने आखिरकार विदाई के समय कच के प्रति अपना प्रेम प्रकट कर दिया.

ब्रह्मचारी कच ने कहा- आप गुरुकन्या हैं. अतः मेरे लिए धर्म-बहन हुईं. देवयानी को बड़ा गुस्सा आया. उसने कहा कि कच को जीवन उसके कारण मिला है. इसलिए उसके जीवन पर उसका अधिकार है.

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