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अगली सुबह विश्वावसु उठे और सदा की तरह दिनचर्या का पालन करते हुए गुफा की तरफ बढ़ निकले. वह जानते थे कि प्रभु का विग्रह वहां नहीं है फिर भी उनके पैर गुफा की ओर खींचे चले जाते थे.
विश्वावसु के पीछे ललिता और रिश्तेदार भी चले. विश्वावसु गुफा के भीतर पहुंचे. जहां भगवान की मूर्ति होती थी उस चट्टान के पास हाथ जोड़कर खडे रहे. फिर उस ऊंची चट्टान पर गिर गए और बिलख–बिलखकर रोने लगे. उनके पीछे प्रजा भी रो रही थी.
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एक भील युवक भागता हुआ गुफा के पास आया. उसने बताया कि महाराज और उनके साथ विद्यापति बस्ती की ओर आ रहे हैं. यह सुनकर सब चौंक उठे. विश्वावसु राजा के स्वागत में गुफा से बाहर आए लेकिन उनकी आंखों में आंसू थे.
राजा इंद्रद्युमन विश्वावसु के पास आए और उन्हें अपने हृदय से लगा लिया.
राजा बोले- भीलराज, तुम्हारे कुलदेवता की प्रतिमा का चोर तुम्हारा दामाद नहीं मैं हूं. उसने तो अपने महाराज के आदेश का पालन किया.
यह सुनकर सब चौंक उठे.
विश्वावसु ने राजा को आसन दिया. राजा ने उस विश्वावसु को शुरू से अंत तक पूरी बात बताकर कहा कि आखिर क्यों यह सब करना पड़ा. फिर राजा ने उनसे अपने स्वप्न और फिर जगन्नाथपुरी में सागरतट पर मंदिर निर्माण की बात कह सुनाई.
राजा ने विश्वावसु से प्रार्थना की- भील सरदार विश्वावसु, कई पीढ़ियों से आपके वंश के लोग भगवान की मूर्ति को पूजते आए हैं. भगवान के उस विग्रह के दर्शन सभी को मिले इसके लिए आपकी सहायता चाहिए.
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ईश्वर द्वारा भेजे गए लकड़ी के कुंदे से बनी मूर्ति के भीतर हम इस दिव्य मूर्ति को सुरछित रखना चाहते हैं. अपने कुल की प्रतिमा को पुरी के मंदिर में स्थापित करने की अनुमति दो. उस कुंदे को तुम स्पर्श करोगे तभी वह हिलेगा.
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HARI ANANT HARI KATHA ANANTA… JAI SHRI JAGNATH BHAGWAN.