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नमि बोले- बलवान उसे माना जाता है जिसने मन पर विजय प्राप्त की हो. इसलिए दूसरों को वश में करने से बेहतर है अपने मन को वश में करना. साधु को शत्रु से लड़ने की जरूरत नहीं होती इस प्रकार तो मैं साधु बन ही चुका हूं.
मेरी बाहर की लड़ाई खत्म हो चुकी है. अब मुझे अपने मन के विकारों पर तत्काल विजय प्राप्त करने की आवश्यकता है जिनके कारण बाहरी शत्रु जन्म लेते हैं. आत्मविजेता ही विश्वविजेता होता है क्योंकि वह मन के भीतर के द्वंद्व को जीत लेता है.
देवदूत ने नमि को प्रणाम किया और बोले- हे राजर्षि आप उत्तम पथ पर हैं. इसमें ही आपका और आपकी प्रजा का भी कल्याण है. देवदूत अपने लोक को चले गए.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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