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राजर्षि नमि बोले- हे देवपुरुष मैंने एक सुरक्षित नगर बनाया है. उसके चारों ओर श्रद्धा, तप और संयम की दीवार बनाई है. रक्षा के लिए मन, वचन और काया की एकरूपता की खाई बनाई है.

अतः संसार के दोष, छल-कपट, काम, क्रोध, माया, मोह और लोभ भी मेरी बनाई खाइयों को लांघकर मेरी आत्मा में प्रवेश नहीं कर सकतीं. मेरा पराक्रम ही मेरा धनुष है. मैंने उस धनुष में धैर्य की मूठ लगाई है और सत्य की डोरी चढ़ाई है. भौतिक संग्राम से मेरा क्या सरोकार?

देवपुरूष ने फिर कहा- राजा का कर्तव्य है कि युद्ध करके अन्य राज्यों को अपने अधिकार में ले, अपने और अन्य राज्यों को सुरक्षित करें. यह कार्य पूर्ण करने के बाद आप सन्यासी बनें तो क्या उत्तम न हो!

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