शास्त्रों में आता है पूजा में जो कमी रह जाए सबकी पूर्ति आरती से की जाती है. आरती से जुड़े कुछ विधान हैं जिनका पालन अवश्य करना चाहिए. आरती सभी ने की होगी. आरती के दौरान कई बार अंजाने में चूक करते रहते हैं. जानिए आरती से जुड़े सारे विधान जो हमेशा काम आएंगे.
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आरती को नीराजन भी कहा जाता है. इसका अर्थ है विशेष रूप से प्रकाशित करना. देवपूजन से प्राप्त सकारात्मक शक्तियां हमारे मन को प्रकाशित कर दें इसलिए आरती जरूरी है. आपको आरती से जुड़ी छोटी-छोटी मगर काम की बातें बताएंगे. इन्हें अपनाकर आप अपनी पूजा के फल को और बेहतर कर सकते हैं.
इस पोस्ट में आप जानेंगे- आरती क्यों करनी चाहिए? आरती किन चीजों से होती है उसका क्या कारण है? किस देवता की कितनी आरती उतारनी चाहिए? घर की आरती और मंदिर की आरती में क्या अंतर है? आरती के क्या-क्या नियम हैं जिनका पालन होना चाहिए? आप समझ लें कि भगवान की आरती से जुड़ी सारी बातें आपको बताई जाएंगी.
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आरती क्यों कर लेनी चाहिए?
कोई ऐसी पूजा करते हों जिसमें आप वैदिक मंत्रों का पाठ नहीं कर पाते वहां आरती जरूर कर लेनी चाहिए. बहुत से लोग वैदिक मंत्रों के पाठ में सहज या समर्थवान नहीं होते. वे वैदिक मंत्रों से पूजन के स्थान पर चालीसा आदि ही केवल पढ़ पाते हैं. उन्हें आरती अवश्य कर लेनी चाहिए. इससे पूजा पूर्ण हो जाती है. बहुत से लोग यहां पर भ्रम में पड़ जाते हैं कि हम किस देवता की आरती करें. पंचदेव उपासना का वैदिक विधान है. यदि आप किसी देवता की आरती नहीं गा पा रहे हैं तो समस्त देवताओं का ध्यान करके उन्हें आरती दिखा सकते हैं. चाहें तो इस मंत्र का उच्चारण कर लें-
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भवं भवानीसहितं नमामि।।
जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है.
यह आरती स्वयं नारायण ने शिव-पार्वती के विवाह के अवसर पर की थी. यह आरती संपूर्ण मानी जाती है. वैसे आप जिस भी इष्ट की आरती करना चाहें कर सकते हैं.
आरती की लौ के ऊपर हाथ फेरकर फिर शरीर का स्पर्श क्यों करते हैं?
आरती का अर्थ है देवताओं की समस्त सकारात्मक शक्तियों को अग्नि के माध्यम से एकत्र करना. आरती की लौ को आत्मा समझना चाहिए. उसके ऊपर से हाथ फेरकर अपने शरीर के अंगों को स्पर्श करने के पीछे भाव है कि देवताओं की शक्ति हमारे मन को प्रकाशित करे.
लौ लेने के बाद शरीर पर स्पर्श करते समय यह प्रार्थना करनी चाहिए- हे ईश्वर हमारे व्यक्तित्व को उज्जवल निर्मल प्रकाशित कर दें.
स्कंद पुराण में भगवान की आरती के संबंध में काफी कुछ बताया गया है. घर में या मंदिर में आरती हो रही हो उस स्थिति में बैठना या लेटना नहीं चाहिए. इससे दोष लगता है. सिर्फ बीमारों के लिए इससे छूट है.
आरती में शंख और घंटा क्यों बजाया जाता है?
आरती पूजा को पूर्णता की ओर ले जाता है. हो सकता है कि पूजा के दौरान मन कई बार उधर-उधर भटक गया हो. उस चूक की भरपाई आरती में होती है. इसलिए आरती के दौरान मन न भटके इसे ध्यान में रखकर गीत-संगीत का समावेश है. इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है. आरती गाने से ध्यान नहीं भटकता. बहुत से लोगों को वह आरती पता नहीं होती. इसलिए शंख और घंटे की ध्वनि को केंद्र में रखकर वे ध्यान एकाग्रचित कर सकते हैं.
लयबद्ध संगीत या ध्वनि ध्यान को केंद्रित करने में सहयोगी है. इसलिए आपने देखा होगा कि घंटा या करताल बजाने का एक नियम रहता है. घंटे की ध्वनि से मन में चल रहे विचारों की उथल-पुथल कम होती जाती है क्योंकि स्नायु तंत्र अपने आसपास की सबसे तीव्र ध्वनि को ही सबसे तेजी से पकड़ता है. इसलिए घंटा और अन्य ध्वनियां की जाती हैं.
कर्पूर या घी से आरती के पीछे है बड़ा कारणः
कर्पूर के आरती में प्रयोग के पीछे वैज्ञानिक कारण हैं. इसके माइक्रो सैल्युलोज जब वाष्पित होते हैं तो उससे जो गंध निकलती है वह शक्तिशाली जीवाणुनाशक होती है. आपने अनुभव किया होगा कि यदि सीलन लगे घर में कर्पूर जलाकर रख दिया जाए तो वहां तुरंत सांस लेने की सारी बाधाएं दूर हो जाती हैं. पूजा पाठ के दौरान पानी, अक्षत, गुड़, दूध, दही और ऐसी बहुत सी वस्तुओं का प्रयोग होता है. कई बार आपस में एक दूसरे से विमेल होते हैं. अर्थात उनके मिलने से जहर बन सकता है. इसलिए पूजा के आखिर में कपूर की आरती कर देने से कोई भी विषैला पदार्थ यदि बना हो वह नष्ट हो जाता है. सोचिए कितनी वैज्ञानिकता के साथ रचा गया है आरती का विधान.
कपूर के समान ही कुछ हद तक गुण गाय के घी में होता है. कर्पूर का फायदा यह है कि उसकी गंध तेजी से फैलती है इसलिए उसका असर ज्यादा है. इसलिए घी की आरती में भी एक टुकड़ा कपूर आखिर में रख ही दिया जाता है. आपको आरती के पीछे का यह वैज्ञानिक कारण जानकर गर्व हुआ होगा.
बत्तियों की संख्याः
मंदिरों में होने वाली आरती में पांच, सात या ग्यारह बत्ती वाला दीपक प्रज्वल्लित किया जाता है. घर पर एक बत्ती वाले दीपक से आरती की जाती है. यदि घर में भी एक से अधिक बत्ती वाले दीपक से करना चाहते हों तो विषम संख्या में बत्ती होनी चाहिए. तीन, नौ एवं तेरह बत्ती वर्जित है. पांच, सात, ग्यारह एवं इक्कीस की संख्या में बत्तियां शुभ मानी जाती हैं.
पांच बत्तियों वाले दीपक को पंच प्रदीप कहते हैं. इसके पीछे भाव यह होता है कि हे भगवान हम पंच-प्राणों के साथ आपकी आरती उतार रहे हैं. घी की ज्योति को आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानना चाहिए. शरीर पंचभूतों से बना है. पांचो बातियां उन पंच भूतों का प्रतिनिधित्व करती हैं. उन्हें पुष्ट करती हैं.
प्रतिदिन कितनी बार करें आरतीः
आरती प्रतिदिन में एक से पांच बार की जा सकती है. घरों में आरती दो बार प्रातःकालीन और संध्याकाल में करनी चाहिए. मंदिरों में पांच बार तक आरती की जाती है.
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दीपक के अतिरिक्त इन वस्तुओं से भी होती है आरतीः
आरती से पहले भगवान को नमस्कार करते हुए तीन बार फूल अर्पित करना चाहिए. आरती केवल धूप-दीप से नहीं होती. पदम पुराण में कहा गया है कि विशेष पूजन में आरती पांच चीजों से की जा सकती है. पहली धूप से, दूसरी दीप से, तीसरी धुले हुए वस्त्र से, कर्पूर से, पांचवी आरती जल से.
आरती की थाल घुमाने का सही क्रम क्या है?
आरती को अपने बांई ओर से शुरू करके दाईं ओर ले जाना चाहिए. यानी घड़ी की सूई की दिशा में घुमाना चाहिए. इस क्रम को सात बार करना चाहिए.
सबसे पहले भगवान की मूर्ति के चरणों में चार बार आरती दिखानी चाहिए. फिर नाभि प्रदेश में दो बार आरती दिखाएं. मुखमंडल में एक बार घुमाना चाहिए. इसके बाद देवमूर्ति के सामने ऊपर से नीचे तक आरती को सात बार गोलाकार घुमाते हुए समस्त अंगों को दिखाना चाहिए.
आरती संपन्न होने के बाद थाल के चारों ओर जल जरूर घुमाया जाना चाहिए. इससे आरती शांत की जाती है.
भगवान की आरती के बाद चंवर डोलाने के पीछे भाव मुख्य कारण है. हे प्रभु यदि भूल से मैंने आरती की लौ आपके बहुत समीप कर दिया हो जिससे आपको जलन हुई हो तो उसे पंखा फेरकर शांत कर रहा हूं.
शास्त्रों में हर देवता के समक्ष घुमाई जाने वाली आरती के संबंध में कुछ विधान कहे गए हैं जिनका पालन होना चाहिए.
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