गणेश चतुर्थी पर गणपति स्थापना, पूजन की संपूर्ण विधि
गणेश चतुर्थी से शुरू होगा वार्षिक दस दिनों का गणेश उत्सव. श्रीगणेश जी को प्रसन्न करने के जो विधान शास्त्रों में कहे गए हैं, उन्हे थोड़ा-थोड़ा करके प्रस्तुत करते रहेंगे. सबसे पहले गणेश चतुर्थी को गणपति स्थापना की वैदिक विधि जानेंगे.
श्री गणेशजी परमदेव हैं, आदि देव हैं. माता पार्वती ने उन्हें प्रसन्न करके अपने पुत्र रूप में आने की प्रार्थना की थी. इसलिए वे गौरीपुत्र कहे गए हैं. गौरीपुत्र, गजानन, एकदंत आदि श्रीमहागणेशजी के स्वरूप हैं जो उन्होंने विभिन्न प्रयोजनों से धारण किया. श्रीगणेश तो आदिदेव हैं जैसे शिव, नारायण, भगवती, सूर्य, ब्रह्मा आदि हैं. गणेश चतुर्थी के बारे में पुराणों में आता है कि इसी दिन महागणपति भगवती पार्वती की लालसा पूरी करने के लिए प्रकट हुए थे.
धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-लोग बस यही समझते हैं कि शिव-पार्वती के पुत्र ही गणेश हैं. यह तो बात वैसी ही हो गई है जैसे देवकी-वासुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण का एक स्वरूप है. श्रीकृष्ण के सारे स्वरूप और नारायण इससे भिन्न हैं. आपको ये बातें थोड़ी अचरज में डालती होंगी परंतु शास्त्र की बात तो यही है. आप प्रभु शरणम् से जुड़ते हैं शास्त्र की वे बातें सीखने समझने को जो कम प्रचलित हैं. जिनकी चर्चा नहीं होती है.
श्रीगणेशजी के दस दिनों के उत्सव में हम प्रभु शरणम् ऐप्प में आपको महागणेश से जुड़े ऐसे ज्ञानवर्धक और रोचक तथ्य लेकर आएंगे जो आपको जानना चाहिए. जिनसे आप अब तक परिचित न थे. विश्वास करें इन्हें पढ़कर आपको बिल्कुल नई बातें जानने को मिलेंगी. ऐसी बातें जिन्हें जानकर मन आनंदित हो जाएगा.
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गणेश चतुर्थी पर गणेशजी की प्रतिमा स्थापना कैसे करेंः
भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी या गणेश चतुर्थी भी कहा जाता है. इस दिन से गणेशजी की पूजा का विशेष उत्सव शुरू होकर अनंत चतुर्दशी को संपूर्ण होती है. श्रीगणेश जी का यह पूजन इसलिए किया जाता है क्योकि पुराणों के अनुसार माता पार्वती के घर में महागणपतिजी ने इसी दिन अवतार ग्रहण किया था. गणेश चतुर्थी की पूजा से जुड़ी सारी शास्त्राधारित बातें आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं. एक अनुरोध करेंगे कि फेसबुक से इस पोस्ट को देखते हुए आप आए हैं. फेसबुक की पोस्ट को आप भी शेयर कर देंगे ताकि किसी और भक्त तक पहुंच जाए. धर्म का प्रचार धर्मकार्य है. इसे अवश्य करें.
इस पोस्ट में आप जानेंगे-
- गणेश चतुर्थी 2017 के मुहूर्त
- गणेश चतुर्थी पर षोडषोपचार विधि से गणपति स्थापना की विधि एवं मंत्र
- गणेश चतुर्थी पर गणपति के अंग पूजा का माहात्मय एवं विधि
- गणेश चतुर्थी की कथा
श्रीगणेशजी की प्रतिमा स्थापना कैसे करेंः
शास्त्रों में भगवान गणेश के स्थापना पूजन विधि को 16 भागों में कहा गया है जिसे षोडशोपचार पूजन विधि कहते हैं. षोडशोपचार में आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, द्रव्य दक्षिणा, आरती, परिक्रमा (प्रदक्षिणा) ये 16 उपचार आते हैं. इन 16 तरीकों से पूजन शुरू करने से पहले भगवान के पूजन का संकल्प लिया जाता है.
यदि भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा आपके घर में अथवा पूजा स्थान में पहले से ही प्राण-प्रतिष्ठित हैं तो षोडशोपचार पूजा में आवाहन और प्रतिष्ठापन के उपचार की आवश्यकता नहीं है. यह कार्य तो उस समय हुआ होगा जब प्रतिमा स्थापना की गई होगी. भगवान श्रीगणेश का आवाहन और प्राण-प्रतिष्ठा नई मूर्ति स्थापना की ही की जाती है. घर में प्रतिष्ठित मूर्तियों का पूजा के पश्चात विसर्जन नहीं किया जाता उनका उत्थापन किया जाता है. षोडशोपचार यानी 16 प्रकार से पूजन की संक्षिप्त और सरलतम विधि इस प्रकार है-
आवाहन के लिए सर्वप्रथम, निम्नमन्त्र को पढ़ते हुए भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा के सम्मुख आवाहन-मुद्रा अर्थात जोड़ने और हथेलियों को खोलकर विनीत भाव में हो जाएं और भगवान का आह्वान करें.
प्राण प्रतिष्ठाः
आह्वान के बाद मूर्ति में भगवान की प्रतिष्ठा करनी होती है. इसके लिए निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए.
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः सुप्रतिष्ठो वरदो भव।।
2. आसन प्रदान करनाः
प्रतिष्ठा के बाद भगवान को आसन समर्पित किया जाता है. आसन के लिए पांच पुष्प अंजुली में लेकर भगवान की प्रतिमा के समक्ष छोड़े और निम्न मंत्र का उच्चारण करें.
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः आसनम् समर्पयामि।।
3. पाद्य समर्पण यानी पैर धुलानाः
आसन देने के बाद निम्न मंत्र पढ़ते हुए भगवान को पांव धोने के लिए जल प्रदान करें.
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः पाद्यं समर्पयामि।।
4. अर्ध्य समर्पणः
इसके बाद भगवान को अर्घ्य समर्पित किया जाता है. अर्घ्य समर्पित करने का अर्थ हुआ जहा भगवान को प्रतिष्ठापित किया है वह वातावारण पवित्र और सुगंधित है.
गंध मिश्रित जल समर्पित करें और निम्न मंत्र का उच्चारण करें.
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः अर्घ्यं समर्पयामि।।
5. आचमन समर्पणः
इसके बाद भगवान को आचमन के लिए जल समर्पित करना चाहिए. निम्न मंत्र पढ़ते हुए भगवान को आचमन के लिए जल समर्पित करें-
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः मुखे आचमनीयं जलं समर्पयामि।।
6.स्नानः
इसके पश्चात भगवान को स्नान कराना चाहिए. भगवान का स्नान भी कई प्रकार से किया जाता है. जल से स्नान, पंचामृत स्नान, दूध, दही, घी, मधु, शर्करा, सुवासित शुद्धोदक स्नान कराया जाता है. जैसे हम स्नान करते हैं तो जल डालते हैं, साबुन लगाते हैं, शैंपू लगाते हैं, कंडीशनर लगाते हैं. फिर तेल, क्रीम स्प्रे आदि करते हैं. उसी प्रकार का भाव है इन स्नान में.
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः सर्वांग स्नानं समर्पयामि।।
7. वस्त्र एवं उपवस्त्र समर्पणः
इसके बाद भगवान को वस्त्र समर्पित किया जाता है. वस्त्र में एक तो पूरा वस्त्र और फिर उत्तरीय जिसे आप गमछा या रूमाल समझ लें.
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः वस्त्रं च उत्तरीयं च समर्पयामि।।
इस मंत्र के साथ गणेश प्रतिमा पर नए वस्त्र एवं उपवस्त्र चढ़ाने चाहिए.
8. यज्ञोवपीत यानी जनेउ समर्पणः
भगवान को निम्न मंत्र पढ़ते हए जनेऊ समर्पण करें-
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि।।
9. गंध समर्पणः
इसके बाद भगवान को सुंगधित द्रव्य समर्पण करना चाहिए और निम्नमंत्र का उच्चारण करना चाहिए.
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः गंधम् समर्पयामि।।
10. अक्षत समर्पणः
इसके बाद अक्षत चावल भगवान को निम्न मंत्र पढ़ते हुए समर्पित करना चाहिए-
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः अक्षतं समर्पयामि।।
11. पुष्प, शमी, दूर्वा घास, सिंदूर आदि शृंगार समर्पित करें
इनमें से जो भी पदार्थ समर्पित कर रहे हों बारी-बारी से उसका नाम लेते जाएं. मंत्र रहेगा- ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः पुष्पं समर्पयामि… इसमें ही जोड़ते जाएं.
12. धूप समर्पणः
इसके बाद धूप जलाकर भगवान को निम्न मंत्र कहते हुए दिखाएं
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः धूपं समर्पयामि।
13. दीप समर्पणः
घी के दीपक जलाकर भगवान को सर्वांग दिखाएं और निम्न मंत्र का पाठ करें-
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः दीपं समर्पयामि।।
14. नैवेद्य या मिष्ठान्न आदि समर्पणः
भगवान को शुद्ध पात्र में मिष्ठान्न जिसमें मोदक या लड्डू सबसे उचित है समर्पित करें. 21 लड्डु का भोग लगाएं. पांच प्रतिमा के पास छोड़कर शेष पूजन के बाद भक्तों में बांट दें.
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः नैवेद्यम् समर्पयामि।।
15. तांबूल समर्पणः
भगवान को पान अर्पित करें एवं निम्न मंत्र का पाठ करें. इस पान में तंबाकू युक्त कुछ भी न हो.
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः पूंगीफलादि सहितम् तांबूलम् समर्पयामि।।
15. द्रव्य दक्षिणा समर्पण
हाथ में कुछ धन लेकर श्रद्धाभाव से भगवान के चरणों में इस भाव से अर्पित करें कि हे भगवान मेरा क्या है, सब आपका ही दिया है. समस्त आपका आपको समर्पित है. आप जो प्रसाद स्वरूप देंगे वही मेरे लिए पर्याप्त है. भावरूप में कुछ दक्षिणा समर्पित कर रहा हूं.
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः दक्षिणां समर्पयामि।।
इसके बाद आरती की जाती है.
आरती एवं प्रदक्षिणाः
इसके बाद भगवान की विधिवत आरती कर लेनी चाहिए. पूजा-पाठ में जो कमियां रह जाती हैं उसकी पूर्ति आरती से हो जाती है. भगवान की कई आरती प्रभु शरणम् ऐप्प के गणपति मंत्र सेक्शन में है. आरती के बाद क्षमा प्रार्थना एवं प्रदक्षिणा या परिक्रमा कर लेनी चाहिए. यदि परिक्रमा के लिए स्थान न हो तो अपने आसन पर ही दाएं से बाएं घूमते हुए परिक्रमा कर लें. गणेशजी की चार परिक्रमा की जाती है.गणेश चतुर्थी की पूजा में लोग अक्सर एक भूल कर देते हैं वह है गणपति के अंगों का विधिवत पूजन न करना. आपको यह भूल नहीं करनी. अंग पूजा के बिना गणेश चतुर्थी की पूजा अधूरी है. यह पूजा बहुत सरल है. दो मिनट लगते हैं. तो इसे क्यों न करें. जानिए अगले पेज पर अंग पूजा.धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-
गणेश चतुर्थी पर गणपति पूजा में की जाने अंग पूजन वाली भूल, आप न करेंः
गणेशजी की पूजा में एक विशेष विधान है भगवान के अंगों की पूजा. अक्सर लोग यही भूल करते हैं, वे गणपति के अंगों की पूजा नहीं करते जो गलत है. प्रथमपूज्य श्रीगणेश के विभिन्न अंगों के पूजन का महात्मय है. शीश के स्थान पर हाथी का मस्तक, एक दांत का टूटने से लेकर, लंबोदर और मूषक वाहन होने के पीछे संसार के कल्याण की गाथा है. अतः गणेश पूजा में उनके अंगों का स्मरण आवश्यक है. आइए जानते हैं उनके अंगों की पूजा का विशेष मंत्र.
गणेश चतुर्थी पर श्री गणेश जी के अंगों की विधिवत पूजाः
गणेश चतुर्थी पर गणपति के अंगों की पूजा इस प्रकार करें. हर मंत्र के साथ उनके उस अंग को धूप,दीप, आरती दिखाएं.
- ऊं गणेश्वराय नमः पादौ पूज्यामि। (पैर पूजन)
- ऊं विघ्नराजाय नमः जानूनि पूज्यामि। (घुटने पूजन)
- ऊं आखूवाहनाय नमः ऊरू पूज्यामि। (जंघा पूजन)
- ऊं हेराम्बाय नमः कटि पूज्यामि। (कमर पूजन)
- ऊं कामरीसूनवे नमः नाभिं पूज्यामि। (नाभि पूजन)
- ऊं लंबोदराय नमः उदरं पूज्यामि। (पेट पूजन)
- ऊं गौरीसुताय नमः स्तनौ पूज्यामि। (स्तन पूजन)
- ऊं गणनाथाय नमः हृदयं पूज्यामि। (हृदय पूजन)
- ऊं स्थूलकंठाय नमः कठं पूज्यामि। (कंठ पूजन)
- ऊं पाशहस्ताय नमः स्कन्धौ पूज्यामि। (कंधा पूजन)
- ऊं गजवक्त्राय नमः हस्तान् पूज्यामि। (हाथ पूजन)
- ऊं स्कंदाग्रजाय नमः वक्त्रं पूज्यामि। (गर्दन पूजन)
- ऊं विघ्नराजाय नमः ललाटं पूज्यामि। (ललाट पूजन)
- ऊं सर्वेश्वराय नमः शिरः पूज्यामि। (शीश पूजन)
- ऊं गणाधिपत्यै नमः सर्वांगे पूज्यामि। (सभी अंगों को धूप-दीप दिखा लें)
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गणेश पूजा में आवश्यक बातें जो ध्यान रखें-
आसन समर्पण करते समय आसन पर पांच फूल रखें.
पाद्य में- चार बार जल, दूब, कमल अर्पित करें
अर्घ्य में- चार बार जल, जायफल, लौंग आदि
मधुपर्क में- कांस्य पात्र में घी, मधु और दही दें.
मधुपर्क के आचमन में सिर्फ एक बार जल दें.
स्नान में- पचास बार जल छिड़कें
वस्त्र- बारह अंगुल से बड़ा और नया वस्त्र होना चाहिए
धूप- गूगल का हो और कांसे के पात्र में हो तो अच्छा
नैवेद्य- एक व्यक्ति के भोजन के लिए पर्याप्त होना चाहिए
दीप- कपास की बाती कम से कम चार अंगुल की. घी के दीपक से भगवान की सात बार आरती की जाती है.
दूर्बा व अक्षत- मोटे अंदाजे से संख्या सौ के ऊपर ही रखें.
जो सामग्री उपलब्ध नहीं हो पाती उसके लिए भगवान गणपति का ध्यान करके उनसे क्षमा प्रार्थना कर लें और विनती करें कि हे गजानन, गौरीसुत गणेशजी आप हमें सामर्थ्य दें कि अगले वर्ष आपकी पूजा में समस्त सामग्री से पूर्ण होकर आपकी पूजा करें.इसके बाद चतुर्थी की कथा कहें. कथा के बाद प्रभु की विधिवत आरती करें और प्रसाद वितरण करें. चतुर्थी की कथा अगले पेज पर देखें.धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-
।।गणेश चतुर्थी पूजन की कथा।।
गणेश चतुर्थी की अनेक कथाएं हैं. इनमें से तीन कथाएं बहुत लोकप्रिय हैं. तीनों कथाओं में से सर्वाधिक प्रचलित कथा यहां प्रस्तुत की जा रही है. शेष दोनों कथाएं प्रभु शरणम् ऐप्प में दी जाएंगी.
एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर बैठे थे. देवी पार्वती ने समय व्यतीत करने के लिए भोलेनाथ से चौपड़ खेलने को कहा. महादेव तैयार हो गए. परन्तु वहां कोई और था नहीं. इसलिए इस खेल में हार-जीत का फैसला कौन करेगा?
भोलेनाथ ने कुछ तिनकों से पुतला बनाया और उसमें प्राण प्रतिष्ठा कर दी. पुतला बालक के रूप में जीवित हो गया. महादेव ने बालक से कहा- पुत्र हम चौपड़ खेलना चाहते हैं. तुम इस खेल का निर्णायक बनो. तुम फैसला करना कि चौपड़ में कौन हारा और कौन जीता?
चौपड का खेल तीन बार खेला गया. संयोग से तीनों बार पार्वतीजी जीत गईं. खेल समाप्त होने पर बालक से देवी ने उसका निर्णय पूछा. उसने महादेव को विजयी घोषित कर दिया. पार्वतीजी क्रोधित हो गईं.उन्होंने कहा- तुममें निर्णायक बनने की क्षमता नहीं है. हार-जीत प्रत्यक्ष देखते हुए भी तुमने कुटिलता से गलत निर्णय सुनाया. इसलिए तुम लंगड़े होकर कीचड में पड़े रहो. बालक ने पैर पकड़ लिए और कहा- आप मेरी माता समान हैं. मैंने द्वेष में ऐसा नहीं किया अज्ञानतावश से हुआ. क्षमा कर दें.
पार्वतीजी पसीज गईं. उन्होंने कहा- यहां गणेश पूजन के लिए नाग कन्याएं आएंगी. उनसे पूजा की विधि समझकर तुम गणेश व्रत करो. ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे. यह कहकर शिव-पार्वती कैलाश चले गए. सालभर बाद नाग कन्याएं गणेश पूजन के लिए आईं.
उनसे पूजन विधि ठीक से समझकर बालक ने श्रीगणेश का 21 दिन लगातार व्रत किया. गणेशजी प्रसन्न हो गए और वर मांगने को कहा.
बालक ने मांगा- हे विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वे यह देख प्रसन्न हों.
श्रीगणेश से वरदान प्राप्त कर वह बालक कैलाश पर्वत पर पहुंच गया. अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई. किसी बात पर पार्वतीजी, भोलेनाथ से रुष्ट हो गईं. बातचीत तक बंद हो गई. कैलाश पर रह रहे उस बालक को भी बात पता चली.
उसने शिवजी से कहा- जैसे माता ने कहा था कि गणेश पूजा करके तुम मेरा स्नेह प्राप्त करोगे. नाराज देवी को मनाने के लिए आप भी वही पूजन करिए. भक्त की बात पर भोलेनाथ मुस्कुराए.वह देवी को प्रसन्न करने के लिए बालक के मन में बसे गणेश आराधना के भाव को बनाए रखना चाहते थे. इसलिए उन्होंने बालक से गणेश पूजा की विधि समझी और व्रत किया. पुत्र के प्रति इस स्नेह के भाव से पार्वती खुश हो गईं. माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिये जो नाराजगी थी वह समाप्त हो गई.
गणेश को प्रथम पूजनीय बनाने से नाराज शिवपुत्र कार्तिकेय दक्षिण में निवास कर रहे थे. देवी को पुत्र से मिलने की बड़ी इच्छा हुई. वह पुत्र से मिलने को बेचैन हो गईं. शिवजी ने युक्ति लगाई. उन्होंने पार्वती से कहा- पुत्र को प्राप्त करने के लिए तुम भी गणेश पूजन करो.
एक पुत्र से मिलन को व्याकुल माता ने दूसरे पुत्र की आराधना करनी शुरू कर दी. कार्तिकेय को खबर लगी. वह भागे-भागे कैलाश आए. माता की पुत्र से भेंट की मनोकामना पूरी हुई. उस दिन से श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरे करने वाला व्रत माना जाता है.आपको यह पोस्ट कैसी लगी, अपने विचार लिखिएगा. प्रभु शरणम् ऐप्प में ऐसे उपयोगी पोस्ट बहुत मिल जाएंगे. छोटा सा ऐप्प है. करीब पांच लाख लोग उसका प्रयोग करके प्रसन्न हैं. आप भी ट्राई करके देखिए. अच्छा न लगे तो डिलिट कर दीजिएगा.
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