March 13, 2026

शिवजी के पांच नागकन्या पुत्रियां भी हैं!

क्या शिवजी की पुत्रियां भी हैं? क्या शिवजी पांच नागकन्या के पिता हैं. विस्मय में पड़ गए. स्वयं पार्वतीजी को भी यह विस्मय हुआ था, जब उन्होंने सुना कि शिवजी पांच नागकन्या के पिता हैं. जीवन की एक बड़ी सीख छिपी है इस कथा में. पढ़िए, सीखिए..

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भक्त जब भावविभोर हो जाता है, वह ईश्वर को अपने जैसा ही समझने लगता है. इसे ही भावातिरेक भक्ति अवस्था कहते हैं. भक्त अपने स्वभाव मेंं भगवान के स्वभाव को खोजने लगता है. आज एक कथा ऐसी सुनेंगे जिसमें शिवजी की पांच बेटियों का प्रसंग आएगा. शिवजी पांच नागकन्याओं के पिता कैसे हुए?

शिवजी के दो पुत्र कार्तिकेयजी और गौरीपुत्र गणेश के बारे में तो आप जानते हैं, पर पांच नागकन्या हैं शिवजी की पुत्रियां! अचरज में डालने की बात है न! शिवजी की पांच नागकन्या पुत्रियों की कथा भावातिरेक भक्ति की कथा है. नागकन्या पुत्रियों की बात सावन मास में मनाए जाने वाले एक उत्सव से आती है. कथा लोकपरंपरा से जुड़ी है पर है तो शिवजी से जुड़ी. इसलिए शिवभक्तों को आनंद आएगा भगवान की इस कथा में. पहले इसका बैकग्राउंड जान लेते हैं-

शिवजी की पांच नागकन्या पुत्रियों की बात कहां से आई?

एक त्योहार है मधुश्रावणी. 13 दिनों का यह पर्व विशेष रूप से बिहार के मिथिलांचल में मनाया जाता है. इसमें शिव-पार्वती की पूजा होती है.  उत्सव में नवविवाहित जोड़े शिव-पार्वती की पूजा करके सुखद दांपत्य का आशीर्वाद लेते हैं. इसके बाद शुरू होता है भक्त और भगवान के बीच हंसी-मजाक का आयोजन. भक्तगण भगवान के दांपत्य जीवन, प्रेम संबंध, आपसी नोंकझोंक, हंसी-ठिठोली आदि के किस्से इस भाव में कहते हैं जैसे शिव-पार्वती उनके घर-परिवार के सदस्य हों. जैसे किसी भी नवविवाहित जोड़ी के साथ हास-परिहास हंसी ठिठोली होती है वैसे ही शिवजी के साथ स्त्रियां भाव से ठिठोली करती हैं.

इन 13 दिनों के उत्सव में हर दिन कोई न कोई ऐसी कथा होती है जिसके केंद्र में शिव-पार्वती होते हैं. उनके संबंध को आम पति-पत्नी के संबंधों जैसा दर्शाने वाला भाव होता है. वास्तव में यह नवविवाहितों को विवाह की गाड़ी को खींचने का गुर सिखाने का बहाना है. इस गाड़ी में बीच-बीच कई बार ब्रेक लगेंगे, कई बार पटरी से उतरती दिखेगी, फिर संभलेगी भी. यह सब कुछ शिव-पार्वतीजी की कपोल कथाओं के माध्यम से सिखाया जाता है.

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आज मधु श्रावणी की एक प्रचलित कथा सुनेंगे जिसमें शिवजी की पांच नागकन्या पुत्रियों की बात आती है. ये कथाएं भक्तों के भाव से उपजी कथाएं हैं. इनकी प्रामाणिकता की पड़ताल से बेहतर है भक्त का भाव देखना जिसमें वह परमात्मा को भी अपने जैसा समझने लगता है. भगवान तो बस उसी भाव के भूखे हैं. विभिन्न कथाओं में सुनिए एक कथाः

नागकन्या पुत्रियों की कथा आरंभः

एक बार भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती एक सरोवर में जल क्रीड़ा कर रहे थे. जलक्रीडा के बीच ही संयोगवश महादेव का तेज स्खलित हो गया. भगवान का तेज है व्यर्थ तो जाएगा नहीं. कोई बुरी शक्ति उसे धारण कर ले तो जीव जन्म जाए वह न जाने कैसा हो. भगवान ने उस तेज को एक बड़े से पत्ते पर रख दिया.

वास्तव में वह पत्ता नहीं था. शिव-पार्वती की क्रीडा का आनंद लेने के लिए एक सर्पिणी ने पत्ते का रूप धर लिया था. उसने वह तेज धारण कर लिया इसे पांच कन्याओं का जन्म हो गया है. धारण करने वाली सर्पिणी थी इसलिए वे कन्याएं देवरूप या मनुष्य रूप में न होकर नागकन्या हुईं. पार्वतीजी को इस रहस्य की जानकारी नहीं हुई. शिवजी के भी मन में न जाने क्या आया, उन्होंने पार्वतीजी को यह बताई नहीं. भोलेनाथ पांचों नागकन्या की बात पार्वतीजी से छुपा गए.

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महादेव के मन में अपने तेज से प्रकट हुई उन पांचों नागकन्याओं के प्रति अनुराग उत्पन्न हुआ. वह उन्हें पुत्री मानने लगे. पुत्रीमोह में पड़े महादेव रोज सरोवर पर पाचों नागकन्या के पास आने लगे.

पार्वतीजी को इससे बड़ा विस्मय हुआ. आजकल भोलेनाथ प्रतिदिन नियम से कहां चले जाते हैं. पति के नियम में बदलाव होने पर पत्नी सशंकित होती है. खासतौर पर शांत रहने वाला पति घूमने-फिरने का अचानक शौकीन हो जाए. पार्वतीजी ने सोचा इसका पता लगाना चाहिए.

रोज की तरह शिवजी नागकन्या पुत्रियों से मिलने चले तो पीछे-पीछे पार्वतीजी भी चुपके से चल पड़ीं. वह उन्हें खोजते-खोजते उस सरोवर पर पहुंच गईं. महादेव वहां नागकन्या पुत्रियों के साथ साथ खेल रहे थे.
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