सर्वमंगल के लिए अवश्य करें चतुर्थी को गणपति पूजन, गणेशजी की पूजा की सरलतम वैदिक विधि
माघ मास की संकष्ठि गणेश चतुर्थी को बहुत फलदायी व्रत माना जाता है. खासतौर से संतान के सुख के लिए इसका बड़ा माहात्म्य कहा गया है. 27 जनवरी को है यह चतुर्थी. हमने कल इस चतुर्थी की संक्षिप्त पूजा विधि और दो प्रचलित व्रत कथाएं बताई थीं. कल की पोस्ट भी इस कथा के अंत मे दिख जाएगी.
बहुत से लोगों ने गणेशजी की चतुर्थी पर विधिवत पूजा की विधि और क्यों होती है संकष्ठि चतुर्थी की पूजा, इसके माहात्म्य के बारे में पूछा है. सबसे पहले माता पार्वती ने ही रखा था संकष्ठि चतुर्थी का व्रत, इसलिए चतुर्थी को पूजने वाले पर गणेशजी अतिप्रसन्न होते हैं.
हर माह में होती है संकष्ठि चतुर्थी उनमें से कुछ वहुत विशेष होती हैं जैसे आज की तिल चतुर्थी. गणपति प्रथमपूज्य, विघ्ननाशक, बुद्धि, विवेक, धन-धान्य और आरोग्य प्रदायक हैं इसलिए इनकी पूजा जरूर करनी चाहिए.
बुधवार को हर माह की चतुर्थी को गणपति की जो विशेष रूप से आराधना करते हैं उनपर गणेशजी बहुत प्रसन्न होते हैं. ग्रह मंडल में बुध और केतू जैसे ग्रहों के स्वामी हैं गणेशजी.
जो लोग चतुर्थी को बहुत पूजा नहीं कर पाते उन्हें कम से कम गणेशजी को “ऊं गं गणपत्यै नमः” की एक माला जपते हुए दूर्वा अवश्य चढ़ानी चाहिए. विद्यार्थियों के लिए तो सफलता के लिए माता सरस्वती के साथ गणेशजी की पूजा अवश्य करनी चाहिए.
सबसे पहले यह पूजा माता पार्वती ने की थी. पढ़िए विधि-विधान से गणेशजी का पूजन और क्यों पार्वतीजी ने रखा था पुत्र गणेशजी का व्रत?
श्रीगणेशजी की में आमतौर पर लोग एक बात की उपेक्षा कर देते हैं वह है गणपति के विभिन्न अंगों की विशेष पूजा. प्रथमपूज्य श्रीगणेश के विभिन्न अंगों के पूजन का महात्मय है.
शीश के स्थान पर हाथी का मस्तक, एक दांत का टूटने से लेकर, लंबोदर और मूषक वाहन होने के पीछे संसार के कल्याण की गाथा है. अतः गणेश पूजा में उनके अंगों का स्मरण आवश्यक है. आइए जानते हैं उनके अंगों की पूजा का विशेष मंत्र.
गणेशजी की विशेष पूजा सायंकाल में भी की जाती है. यदि आपने दिन में पूजा कर ली है तो भी संध्याकाल में गणपति के अंगों की आरती अवश्य कर लें. यह छोटा सा विधान बड़ा प्रभावशाली है. सुख-संपत्ति, संतान, आरोग्य, बल, बुद्धि और विद्यादायक है.
निम्न मंत्रों से करें गणेशजी के अंगों की पूजा. हर मंत्र के साथ उनके उस अंग को धूप,दीप, आरती दिखाएं.
. ऊं गणेश्वराय नमः पादौ पूज्यामि। (पैर पूजन)
. ऊं विघ्नराजाय नमः जानूनि पूज्यामि। (घुटने पूजन)
. ऊं आखूवाहनाय नमः ऊरू पूज्यामि। (जंघा पूजन)
. ऊं हेराम्बाय नमः कटि पूज्यामि। (कमर पूजन)
. ऊं कामरीसूनवे नमः नाभिं पूज्यामि। (नाभि पूजन)
. ऊं लंबोदराय नमः उदरं पूज्यामि। (पेट पूजन)
. ऊं गौरीसुताय नमः स्तनौ पूज्यामि। (स्तन पूजन)
. ऊं गणनाथाय नमः हृदयं पूज्यामि। (हृद्य पूजन)
. ऊं स्थूलकंठाय नमः कठं पूज्यामि। (कंठ पूजन)
. ऊं पाशहस्ताय नमः स्कन्धौ पूज्यामि। (कंधा पूजन)
. ऊं गजवक्त्राय नमः हस्तान् पूज्यामि। (हाथ पूजन)
. ऊं स्कंदाग्रजाय नमः वक्त्रं पूज्यामि। (गर्दन पूजन)
. ऊं विघ्नराजाय नमः ललाटं पूज्यामि। (ललाट पूजन)
. ऊ सर्वेश्वराय नमः शिरः पूज्यामि। (शीश पूजन)
. ऊं गणाधिपत्यै नमः सर्वांगे पूज्यामि। (सभी अंगों को धूप-दीप दिखा लें)गणेश पूजा में आवश्यक बातें जो ध्यान रखें-
. आसन समर्पण करते समय आसन पर पांच फूल रखें.
. पाद्य में- चार बार जल, दूब, कमल अर्पित करें
. अर्घ्य में- चार बार जल, जायफल, लौंग आदि
. मधुपर्क में- कांस्य पात्र में घी, मधु और दही दें.
. मधुपर्क के आचमन में सिर्फ एक बार जल
. स्नान में- पचास बार जल छिड़कें
. वस्त्र- बारह अंगुल से बड़ा और नया वस्त्र होना चाहिए
. धूप- गूगल का हो और कांसे के पात्र में हो तो अच्छा
. नैवेद्य- एक व्यक्ति के भोजन के लिए पर्याप्त होना चाहिए
. दीप- कपास की बाती कम से कम चार अंगुल की. घी के दीपक से भगवान की सात बार आरती की जाती है.
. दूर्बा व अक्षत- मोटे अंदाजे से संख्या सौ के ऊपर ही रखें.
जो सामग्री उपलब्ध नहीं हो पाती उसके लिए भगवान गणपति का ध्यान करके उनसे क्षमा प्रार्थना कर लें और विनती करें कि हे गजानन, गौरीसुत गणेशजी आप हमें सामर्थ्य दें कि अगले वर्ष आपकी पूजा में समस्त सामग्री से पूर्ण होकर आपकी पूजा करें.
इसके बाद गणेश चतुर्थी की कथा कहें. कथा के बाद प्रभु की विधिवत आरती करें और प्रसाद वितरण करें.
गणेश चतुर्थी पूजन की कथाः
एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर बैठे थे. देवी पार्वती ने समय व्यतीत करने के लिए भोलेनाथ से चौपड़ खेलने को कहा. महादेव तैयार हो गए. परन्तु वहां कोई और था नहीं. इसलिए इस खेल में हार-जीत का फैसला कौन करेगा?
भोलेनाथ ने कुछ तिनकों से पुतला बनाया और उसमें प्राण प्रतिष्ठा कर दी. पुतला बालक के रूप में जीवित हो गया. महादेव ने बालक से कहा- पुत्र हम चौपड़ खेलना चाहते हैं. तुम इस खेल का निर्णायक बनो. तुम फैसला करना कि चौपड़ में कौन हारा और कौन जीता?चौपड का खेल तीन बार खेला गया. संयोग से तीनों बार पार्वतीजी जीत गईं. खेल समाप्त होने पर बालक से देवी ने उसका निर्णय पूछा. उसने महादेव को विजयी घोषित कर दिया. पार्वतीजी क्रोधित हो गईं.
उन्होंने कहा- तुममें निर्णायक बनने की क्षमता नहीं है. हार-जीत प्रत्यक्ष देखते हुए भी तुमने कुटिलता से गलत निर्णय सुनाया. इसलिए तुम लंगड़े होकर कीचड में पड़े रहो. बालक ने पैर पकड़ लिए और कहा- आप मेरी माता समान हैं. मैंने द्वेष में ऐसा नहीं किया अज्ञानतावश से हुआ. क्षमा कर दें.
पार्वतीजी पसीज गईं. उन्होंने कहा- यहां गणेश पूजन के लिए नाग कन्याएं आएंगी. उनसे पूजा की विधि समझकर तुम गणेश व्रत करो. ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे. यह कहकर शिव-पार्वती कैलाश चले गए. सालभर बाद नाग कन्याएं गणेश पूजन के लिए आईं.
उनसे पूजन विधि ठीक से समझकर बालक ने श्रीगणेश का 21 दिन लगातार व्रत किया. गणेशजी प्रसन्न हो गए और वर मांगने को कहा. बालक मांगा- हे विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वे यह देख प्रसन्न हों.
श्रीगणेश से वरदान प्राप्त कर वह बालक कैलाश पर्वत पर पहुंच गया. अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई. किसी बात पर पार्वतीजी, भोलेनाथ से रुष्ट हो गईं. बातचीत तक बंद हो गई. कैलाश पर रह रहे उस बालक को भी बात पता चली.उसने शिवजी से कहा- जैसे माता ने कहा था कि गणेश पूजा करके तुम मेरा स्नेह प्राप्त करोगे. नाराज देवी को मनाने के लिए आप भी वही पूजन करिए. भक्त की बात पर भोलेनाथ मुस्कुराए.
वह देवी को प्रसन्न करने के लिए बालक के मन में बसे गणेश आराधना के भाव को बनाए रखना चाहते थे. इसलिए उन्होंने बालक से गणेश पूजा की विधि समझी और व्रत किया.
पुत्र के प्रति इस स्नेह के भाव से पार्वती खुश हो गईं. माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिये जो नाराजगी थी वह समाप्त हो गई.
गणेश को प्रथम पूजनीय बनाने से नाराज शिवपुत्र कार्तिकेय दक्षिण में निवास कर रहे थे. देवी को पुत्र से मिलने की बड़ी इच्छा हुई.
वह पुत्र से मिलने को बेचैन हो गईं. शिवजी ने युक्ति लगाई. उन्होंने पार्वती से कहा- पुत्र को प्राप्त करने के लिए तुम भी गणेश पूजन करो.
एक पुत्र से मिलन को व्याकुल माता ने दूसरे पुत्र की आराधना करनी शुरू कर दी. कार्तिकेय को खबर लगी. वह भागे-भागे कैलाश आए.
माता की पुत्र से भेंट की मनोकामना पूरी हुई. उस दिन से श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरे करने वाला व्रत माना जाता है. नीचे देखिए तिल चतुर्थी की व्रत कथा एवं संक्षिप्त पूजन विधि.
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।।श्री गणेशाय नमः।।
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