अर्जुन से अज्ञानता में हुया श्रीराम का अपमान, हनुमानजी ने सबक सिखाया तो देने लगे प्राण रीक्षा में असफल अर्जुन देने चले प्राण, श्रीकृष्ण से मिला जीवनदान

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बात तब की है जब पांडव जुए में राजपाट हारकर वनवास झेल रहे थे. भगवान श्रीकृष्ण के सुझाव पर अर्जुन विभिन्न देवताओं को प्रसन्न कर उनसे शक्तियां प्राप्त कर रहे थे. वह प्रत्येक तीर्थ पर गए.
अर्जुन अपनी यात्रा में रामेश्वरम पहुंचे. वहां श्रीराम ने वानर सेना की सहायता से समुद्र पर विशाल सेतु का निर्माण किया था. अर्जुन को पुल निर्माण में श्रीराम को आई बाधाओं और वानर सेना के परिश्रम के बारे में सुनने को मिला.
अर्जुन अहंकारवश सोचने लगे कि श्रीराम अतुलनीय धनुर्धर थे. फिर उन्हें पुल बनाने के लिए वानर सेना से पत्थर क्यों डलवाने पड़े. वह अपने बाणों की सहायता से समुद्र पर आसानी से पुल बना सकते थे.
हनुमानजी को यह बात चुभी. वह अर्जुन से बोले- अगर तुम बड़े धनुर्धर हो तो क्या अपने बाणों से एक ऐसा पुल बना सकते हो जो सिर्फ मेरा भार सहन कर सके.
अर्जुन इस चुनौती से तैश में आ गए. उन्होंने दिव्य बाण चलाए और फटाफट हनुमानजी के लिए एक पुल बना दिया. हनुमानजी ने अपना एक पांव रखा और पुल धंसकर समुद्र में समा गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
अर्जुन लज्जित हो गए. उन्होंने फिर प्रयास किया. हनुमानजी ने फिर वैसा ही किया. अर्जुन बार-बार अपने दिव्यास्त्रों का आह्वान कर पुल बनाते और हनुमानजी ध्वस्त कर देते.
अर्जुन को आत्मग्लानि हो रही थी. मेरी जिस धनुर्विद्या पर पांडवों का पूरा मान टिका हुआ है उसमें इतना भी सामर्थ्य नहीं कि वह एक वानर के चलने योग्य पुल बना सके.
अर्जुन ने प्रण किया कि अगर इस बार भी वह असफल रहे तो समुद्र में कूदकर प्राण दे देंगे. अर्जुन ने अपनी समस्त शक्तियों का आह्वान कर और श्रीकृष्ण का स्मरण कर तीर चलाया और पुल बनाया.
हनुमानजी फिर उस पुल को तोड़ने के लिए चढ़े लेकिन श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र उसका आधार बन गया जिससे पुल टूट नहीं पाया.
श्रीकृष्ण कछुए का वेश धरकर वहां आए. उन्होंने अर्जुन को आत्महत्या के विचारों के लिए खूब खरी-खोटी सुनाई और अभिमानमुक्त होने की सीख दी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
श्रीकृष्ण ने हनुमानजी से कहा- आप सूर्यदेव के शिष्य और परमज्ञानी हैं. आप स्वयं अतुलित बलशाली हैं. एक वीर को दूसरे वीर का सम्मान करना चाहिए न कि नीचा दिखाने की कोशिश करनी चाहिए.
हनुमानजी को भी पछतावा हुआ. उन्होंने प्रभु से क्षमा मांगी और अर्जुन से कहा- मैं अपनी भूल का प्रायश्चित करने के लिए महाभारत के युद्ध में तुम्हारे साथ रथ में स्थित होकर रथ को स्थायित्व दूंगा.
महाभारत युद्ध की समाप्ति पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पहले रथ से उतरने का आदेश दिया. श्रीकृष्ण सारथी थे और सारथी, रथस्वामी से पहले उतरता है. प्रतिदिन यही होता था. लेकिन अंतिम दिन श्रीकृष्ण ने उसके उलट आदेश दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
अर्जुन ने हैरत से श्रीकृष्ण की ओर देखा और रथ से उतर गए. श्रीकृष्ण के उतरने के बाद हनुमानजी रथ से उड़ गए. उनके उड़ते ही रथ में भयंकर विस्फोट हुआ और उसके टुकड़े-टुकड़े हो गए.
पांडवों में खलबली मची. श्रीकृष्ण ने कहा- डरने की बात नहीं. शत्रुपक्ष के दिव्यास्त्रों के प्रहार से यह रथ तो कब का नष्ट हो चुका था. इसे तो मैंने और हनुमानजी ने संभाल रखा था. हमारे रथ से अलग होते ही यह नष्ट हो गया.
श्रीकृष्ण न होते तो महाभारत की कथा ही अलग होती लेकिन धर्म की रक्षा के लिए भगवान न आएं, ऐसा हो ही नहीं सकता.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली