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भक्ति बुद्धि से नहीं भाव से प्राप्त होती है- प्रेरक कथा

भक्ति बुद्धि से नहीं भाव से प्राप्त होती है- प्रेरक कथा

भक्ति बुद्धि से नहीं भाव से प्राप्त होती है: एक प्रेरक प्रसंग

हमारे सनातन धर्म और आध्यात्मिक इतिहास में ईश्वर को पाने के कई मार्ग बताए गए हैं—ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग और भक्ति मार्ग। इनमें से किस मार्ग को सर्वश्रेष्ठ माना जाए, इस पर अक्सर विद्वानों के बीच लंबी चर्चाएं होती हैं। लेकिन महापुरुषों का मानना है कि जब तक किसी साधना में ‘भाव’ न हो, तब तक वह केवल एक बौद्धिक व्यायाम बनकर रह जाती है। आज का यह प्रेरक प्रसंग इसी सत्य को उजागर करता है कि सर्वश्रेष्ठ भक्ति का मार्ग क्या है और क्यों ईश्वर की प्राप्ति में हमारी बुद्धि नहीं, बल्कि हमारा हृदय और समर्पण सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जब व्याकरण के ज्ञान पर भारी पड़ा एक भक्त का विरह

यह प्रसंग उस समय का है जब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने शिष्यों के साथ भ्रमण पर निकले थे। एक गांव से गुजरते हुए उन्होंने देखा कि वहां एक स्थान पर कुछ ग्रामीण इकट्ठा हैं। उनके बीच में एक साधारण सा युवक बैठा था, जिसके हाथों में श्रीमद्भगवद्गीता थी। वह युवक अत्यंत करुण स्वर में गीता के श्लोकों का पाठ कर रहा था और पाठ करते-करते उसकी आँखों से अश्रुधारा बहे जा रही थी। वह पूरी तरह से किसी अज्ञात आनंद और विरह के भाव में डूबा हुआ था।

वहां से गुजर रहे विद्वान और शिष्य उसके अशुद्ध संस्कृत उच्चारण को सुनकर मुस्कुरा रहे थे। चैतन्य महाप्रभु भी कुछ देर रुककर उसके श्लोक-उच्चारण को ध्यान से सुनने लगे। युवक के उच्चारण से महाप्रभु को तुरंत यह आभास हो गया कि इस व्यक्ति को संस्कृत व्याकरण या भाषा का कोई ज्ञान नहीं है। लेकिन महाप्रभु को इस बात पर गहरा आश्चर्य हुआ कि जिस व्यक्ति को भाषा की समझ ही नहीं है, वह उन गूढ़ श्लोकों को पढ़ते हुए इस कदर भाव-विभोर कैसे हो सकता है कि उसके आंसू थमने का नाम न लें?

क्या तुम इस पाठ का अर्थ जानते हो?

उत्सुकतावश चैतन्य महाप्रभु उस युवक के अत्यंत समीप पहुंचे। उन्होंने बड़े प्रेम से पूछा, “हे युवक! तुम जो इन श्लोकों को इतनी तन्मयता से बांच रहे हो, क्या तुम इसका वास्तविक अर्थ भी समझते हो?”

महाप्रभु की आवाज सुनकर युवक ने अपनी आंखें खोलीं, जो रोने के कारण पूरी तरह लाल हो चुकी थीं। उसने बड़ी मुश्किल से अपने आंसुओं को रोका, महाप्रभु के चरणों में प्रणाम किया और अत्यंत संकोच व सरलता से कहा, “नहीं प्रभु! मैं तो एक नितांत अज्ञानी मनुष्य हूँ। मुझे न तो संस्कृत का ज्ञान है और न ही मैं इन महान श्लोकों का कोई शब्दार्थ या व्याकरण जानता हूँ।”

युवक का यह उत्तर सुनकर महाप्रभु का कौतुक और अधिक बढ़ गया। उन्होंने पुनः प्रश्न किया, “यदि तुम इन पंक्तियों का अर्थ ही नहीं समझते, तो फिर इस कदर रोने का क्या कारण है? तुम्हारे इन आंसुओं के पीछे कौन सा रहस्य छिपा है?”

भाव की पराकाष्ठा और अश्रुओं का रहस्य

युवक ने हाथ जोड़कर, सिर झुकाए हुए जो उत्तर दिया, वह भक्ति के इतिहास में अमर हो गया। उसने कहा, “प्रभु! भले ही मुझे शब्दों का अर्थ समझ न आता हो, लेकिन जब भी मैं इस पवित्र ग्रंथ को अपने हाथों में लेता हूँ, तो मेरी आँखों के सामने एक सजीव दृश्य उपस्थित हो जाता है। मैं सोचने लगता हूँ कि यह वही दिव्य उपदेश है जो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को दिया था। मैं यह कल्पना करने लगता हूँ कि चराचर जगत के स्वामी, साक्षात पूर्णब्रह्म, अपने भक्त के सारथी बनकर बैठे हैं और उसे जीवन का परम सत्य समझा रहे हैं। बस, यही विचार मेरे हृदय को छू जाता है। ‘यह मेरे प्रभु की वाणी है’—यही सोचकर मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठता है, मेरा हृदय भाव-विभोर हो जाता है और चाहकर भी मैं अपने आंसुओं को रोक नहीं पाता।”

युवक की यह निष्कपट और निश्छल बात सुनकर चैतन्य महाप्रभु स्वयं भाव-समाधि में चले गए। उनके भीतर का भक्त जाग उठा। उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर उस अज्ञानी माने जाने वाले युवक को अपने गले से लगा लिया। महाप्रभु की आंखों से भी प्रेमाश्रुओं की धारा बहने लगी।

उन्होंने अपने शिष्यों की ओर मुड़कर बड़े गर्व से कहा, “देखो! गीता का यथार्थ और इसका वास्तविक सार तो केवल इस सीधे-सादे युवक ने ही समझा है। बाकी दुनिया तो केवल इसके शब्दों को रट रही है, इसके व्याकरण को खंगाल रही है और अपनी बुद्धि का अहंकार पाल रही है।”

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सर्वश्रेष्ठ भक्ति का मार्ग: बुद्धि बड़ी या भाव?

यह प्रसंग हमें अध्यात्म के एक बहुत बड़े सत्य से परिचित कराता है। आज के युग में हम किसी भी चीज़ को मापने के लिए अपनी बुद्धि, तर्क और गणनाओं का सहारा लेते हैं। व्यावहारिक दुनिया को चलाने के लिए बुद्धि बेशक एक बहुत उपयोगी और भरोसेमंद साथी है, इसके बिना संसार का व्यवहार संभव नहीं है। लेकिन जब बात ईश्वर को पाने की या अध्यात्म के शिखर को छूने की आती है, तो वहाँ बुद्धि की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं।

भगवान को किसी शास्त्र के पांडित्य या भाषा के व्याकरण से नहीं बांधा जा सकता। भक्ति के मार्ग में जब समर्पण का उदय होता है, तो सारी चालाकी और बौद्धिक क्षमताएं पीछे छूट जाती हैं। प्रभु केवल भाव के भूखे हैं। यदि आपके भीतर वह निश्छल तड़प और गहरा भाव है, तो आप अनपढ़ या अज्ञानी होते हुए भी उस परम तत्व के सबसे करीब होते हैं, जिसे बड़े-बड़े विद्वान वर्षों की तपस्या के बाद भी नहीं छू पाते।

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कहानी से सीख:

भक्ति का मार्ग कोई कठिन साधना नहीं, बल्कि अपने अहंकार को मिटाकर प्रभु के चरणों में पूरी तरह से खुद को सौंप देना है। जैसे ही हमारे भीतर से ‘मैं ज्ञानी हूँ’ का भाव समाप्त होता है, वैसे ही साक्षात प्रेम का प्राकट्य हो जाता है।


संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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