हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:fb]

वहां विष्णुजी शेषनाग पर लेटे थे, माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं. भृगु को देखकर श्रीहरि उठे नहीं. दो जगहों से अपमानित होकर भागे भृगु अपने पर नियंत्रण नहीं रख सके. क्रोधित महर्षि ने श्रीहरि की छाती पर पैर से प्रहार कर दिया.

भगवान विष्णु ने उनका पैर पकड लिया और पूछा कि मेरी कठोर छाती से आपके पैरों को चोट तो नहीं लगी. इस विनयशीलता से महर्षि प्रसन्न हो गए और उनको श्रीविष्णु को देवताओं में सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दिया.

देवताओं को अपमानित करने के कारण महर्षि को गंगा के तट पर तप कर प्रायश्चित करने और दोषमुक्त होने के लिए जाने का आदेश मिला. भृगु अपनी पत्नी ख्याति के साथ आश्रम में रहकर प्रायश्चित करने लगे.

ख्याति को यह आशीर्वाद प्राप्त था कि वह ममता से भरकर जिसका स्पर्श कर देंगी उसके सभी घाव भर जाएंगे. देवताओं और असुरों में स्वर्ग के आधिपत्य को लेकर संग्राम शुरू हुआ.

असुर प्रजापित दक्ष से मदद मांगने गए तो उन्होंने असुरों से कहा कि वह देवताओं से शत्रुता मोलना नहीं चाहते लेकिन चूंकि असुर मदद मांगने आएं हैं तो उन्हें खाली हाथ नहीं जाना पड़ेगा.

शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.

4 COMMENTS

    • आपके शुभ वचनों के लिए हृदय से कोटि-कोटि आभार.
      आप नियमित पोस्ट के लिए कृपया प्रभु शरणम् से जुड़ें. ज्यादा सरलता से पोस्ट प्राप्त होंगे और हर अपडेट आपको मिलता रहेगा. हिंदुओं के लिए बहुत उपयोगी है. आप एक बार देखिए तो सही. अच्छा न लगे तो डिलिट कर दीजिएगा. हमें विश्वास है कि यह आपको इतना पसंद आएगा कि आपके जीवन का अंग बन जाएगा. प्रभु शरणम् ऐप्प का लिंक? https://goo.gl/tS7auA

  1. प्रियवर बंधु
    आपकी कथा विचार करने योग्य है। परंतु आपने गलत ज्ञान दिया है।
    विष्णु जी को ही बार बार अवतार इसलिए लेना पड़ता है क्योंकि वो सृष्टि के पालनहार हैं।
    और जब मनुष्य जाती पर कोई संकट आता है तब पालनहार होने की वजह से उन्हें ही अवतार लेना पड़ता है।

    अच्छा चलो आपकी बात मन भी लें तो इसका कोई सबूत है मतलब ये कथा किस पुराण या वेद में लिखा है। या ऐसे ही कोई कहानी बना दी।

    कृपया उत्तर अवश्य दें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here