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लूट−मार तथा हत्या के काम में लिप्त रहते. संत स्वभाव की श्रमणा इससे बहुत दुखी रहती और ससुराल से उसे दुत्कार ही मिलती.

उस गन्दे माहौल में श्रमणा जैसी सात्विक स्त्री का रहना बड़ा कष्टकर हो गया था. वह उस माहौल से निकल भागना चाहती थी.

लेकिन समस्या यह थी कि यदि वह घर के घुटन से निकल भी भागी, तो किसके पास जाकर आश्रय के लिए शरण मांगेगी! कहां मिलेगा ठिकाना?

श्रमणा का धैर्य एकदिन जवाब दे गया और वह घर से निकलकर पास के ही मतंग ऋषि के आश्रम में जा पहुंची.

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