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महाराज जी चले जा रहे थे. अंधेरे के कारण उन्हें दिखाई न पड़ा और कबीर पर पैर पड़ गया. उनके पांव के नीचे कोई मानुष आ गया तो मुख से निकला- ‘राम….. राम…!’
कबीर का तो काम सध गया. गुरु के दर्शन भी हो गए, उनकी पादुकाओं का स्पर्श भी मिला और स्वयं उनके श्रीमुख से ‘राम’ मंत्र भी मिल गया. गुरूदीक्षा ऐसे ही तो होती थी.
गुरू एकांत में कोई मंत्र कान में फूंकते थे और शिष्य उनके चरणों में शीश रख देता. रामनाम का जब मंत्र मिला तब वहां ईश्वर के अतिरिक्त कोई और था नहीं. पादुका का स्पर्श हो ही गया, फिर दीक्षा में बाकी ही क्या रह गया?
कबीर जी उमंग में झूमते घर वापस आए. राम नाम की और साथ में गुरुदेव के नाम की रट लगा दी.
अत्यंत स्नेहपूर्ण हृदय से गुरुमंत्र का जप करते, गुरुनाम का कीर्तन करते हुए भक्ति में डूब गए. दिनोंदिन उनकी मस्ती बढ़ने लगी.
एक मुसलमान रामनाम जपता रहता है!! यह बात काशी के पंडितों तक पहुंची तो हायतौबा मच गई. पता चला कि वह राम और रामानंद के नाम का कीर्तन करता रहता है.
इस विधर्मी मुसलमान को रामनाम की दीक्षा किसने दी? क्यों दी? मंत्र को भ्रष्ट कर दिया! मामले ने तूल पकड़ लिया.
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