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राजा विक्रमादित्य ने कहा- जिसने शेर में प्राण डाले उसने ही सबसे बड़ा अपराध किया. उसके कारण ही सभी ब्राह्मण कुमारों के प्राण गए हैं. बेताल ने पूछा- ऐसा क्यों. सबका दोष बराबर का क्यों नहीं?

विक्रमादित्य ने कहा- जब उन्हें सड़ी गली हड्डियां दिखीं तो वे यह नहीं जानते थे कि ये किस जानवर के शेष हैं, क्योंकि वे ब्राह्मण कुमार थे, क्षत्रिय नहीं. इसलिए उन्होंने कभी शिकार नहीं किया होगा.

विद्या के प्रयोग से पहले ने हड्ड़ियों का दोष दूरकर उसमें सही किया और ढांचा गढ़ दिया. दूसरे ने विद्या के प्रयोग से उसमें मांस, रक्त आदि बना दिया. तीसरे ने उसमें त्वचा और बाल आदि बना दिए. तभी उन्हें पता चला होगा कि यह तो भयानक सिंह है.

चौथे व्यक्ति के पास सबसे अहम विद्या थी. जिसके पास जितनी ज्यादा बड़ी विद्य़ा या सिद्धि होती है, उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है. उसे सिंह में प्राण फूंकने चाहिए या नहीं इसका विचार करना चाहिए था लेकिन उसे तो ज्ञान के प्रदर्शन की बेचैनी थी.

इसलिए शेर में प्राण फूंकने वाला चौथा व्यक्ति ही सभी की अकाल मृत्यु का जिम्मेदार माना जाएगा. जिनके पास जितना गुण होता है, उतना ही उस गुण को संरक्षित रखने का प्रयास करना चाहिए, अन्यथा अनिष्ट होता है जैसा उन चारों के साथ हुआ.
(भविष्य पुराण से)

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश
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