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वह बहुत हद तक क्षत-विक्षत और सड़ गल गई थीं. उसे बिना पहचाने ही उन्होंने उठा लिया. एक ने मांस डाला, दूसरे ने उसमें खाल और बाल पैदा कर दिए, तीसरे ने सारे अंग बनाए.
अब वह शेर बनकर तैयार हो चुका था. दिखने में तगड़ा और सुंदर स्वस्थ. बस प्राण ही नहीं थे. निष्प्राण होने के कारण शेर धरती पर पड़ा हुआ था. तीनों की विद्या का परीक्षण हो चुका था.
चौथा अपनी प्रतिभा दिखाने को इतना उतावला हो चुका था. इससे पहले कि उस शेर में प्राण डालने के संबंध में कोई निर्णय होता उसने आव देखा न ताव शेर में प्राण डाल दिए.
शेर जीवित हो उठा. वह भूखा था. उसे अपने सामने चार शिकार आराम से खड़े हो दिखे. इससे अच्छा अवसर क्या होता. उसने सबको मारकर खा लिया.
यह कथा सुनाकर बेताल बोला- हे राजा, चारों ब्राह्मण अकाल ही मृत्यु के ग्रास बन गये. भूल उन्हीं की थी तो, किसी अन्य का कोई दोष नहीं. पर यह बताओ कि उन चारों में इस दुर्घटना का अपराधी कौन है?
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