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एक बार वह महर्षि पराशर के आश्रम में पहुँच गया. वहाँ उसने आदत के अनुसार मिट्टी के सारे पात्र तोड़ दिए, आश्रम की वाटिका उजाड़ डाली. सारे वस्त्रों और ग्रंथों को कुतर दिया.

भगवान गणेश भी उसी आश्रम में थे. महर्षि पराशर ने चूहे की करतूत गणेशजी को बताई. भगवान गणेश ने उस दुष्ट मूषक को सबक सिखाने की सोची.

उन्होंने मूषक को पकड़ने के लिए अपना पाश फेंका. पाश मूषक का पीछा करता हुआ पाताल लोक तक पहुंचा. पाश मूषक के गले में अटक गया और मूषक बेहोश हो गया.

पाश में घिसटता हुआ मूषक गणेशजी के सम्मुख उपस्थित हुआ. जैसे ही होश आया उसने बिना पल गंवाए गणेशजी की आराधना शुरू कर दी और अपने प्राणों की भीख मांगने लगा.

गणेश जी मूषक की आराधना से प्रसन्न हो गए. उन्होंने कहा- तुमने लोगों को बहुत कष्ट दिए है. मैंने दुष्टों के नाश एवं साधुओं के कल्याण के लिए ही अवतार लिया है.

तुम शरणागत हो इसलिए क्षमा करता हूं. मैं तुमसे प्रसन्न हूं कोई वरदान मांग लो. क्रौंच आदत से मजबूर था. गणेशजी से प्राणदान मिलते ही फिर से उसमें अहंकार जाग गया.

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