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हनुमानजी ने कहा- आप चिंता न करें मैं अभी लेकर आता हूं. प्रभु के आशीर्वाद से मेरा सामर्थ्य और गति इतनी है कि दस वर्षका समय पलभर में पार कर लूं.

हनुमानजी को भेजकर श्रीराम ने दुर्गास्तुति आरंभ की. हनुमानजी अत्यंद वेग से 108 नीलकमल लेकर लौट भी आए. श्रीराम ने वे फूल देवी को अर्पित करने आरंभ कर दिए.

देवी ने प्रभु की परीक्षा लेने के लिए उनमें से एक कमल छिपा लिया. गिनती में एक कमल कम दिखा तो प्रभु श्रीराम ने कहा- हनुमानजी एक कमल कम हैं. लेकर आइए.

हनुमानजी ने कहा- प्रभु देवीदह में तो 108 कमल ही थे. मैं सारे लेता आया. मेरी गिनती पक्की थी. देवी ने ही कोई माया रची है आपकी परीक्षा लेने के लिए. श्रीराम ने युक्ति निकाली.

उन्होंने लक्ष्मणजी से कहा- तुम और मुझसे प्रेम रखने वाले सभी लोग मुझे कमलनयन कहते हो. अतः यदि मैं अपना एक नेत्र देवी को अर्पित कर दूं तो एक पुष्प की कमी पूरी हो जाएगी.

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