अयोध्या और राजा दशरथ की चिंता
कौशल प्रदेश, जिसकी स्थापना स्वयं आदिपुरुष मनु ने की थी, पवित्र सरयू नदी के पावन तट पर बसा हुआ एक अत्यंत समृद्ध और दिव्य क्षेत्र था। इसी पुण्यभूमि में बसी थी भव्य, सुंदर और सुव्यवस्थित अयोध्या नगरी, जो न केवल कौशल राज्य की राजधानी थी, बल्कि धर्म, मर्यादा और आदर्श जीवन का जीवंत प्रतीक भी थी। अयोध्या की गलियों में मानो सुख और शांति स्वयं विचरण करते थे, और सरयू की कल-कल धारा इस नगरी के सौंदर्य को और भी पवित्र बना देती थी।
मनु के वंश में अनेक पराक्रमी, तेजस्वी और यशस्वी राजाओं ने जन्म लिया था। इन्हीं महान राजाओं की परंपरा में एक थे—महाराज दशरथ। वे केवल एक शक्तिशाली राजा ही नहीं, बल्कि वेदों के गहन ज्ञाता, धर्म के प्रति समर्पित, दयालु हृदय वाले, रणकुशल योद्धा और अपनी प्रजा को संतानवत् प्रेम करने वाले शासक थे। उनके शासन में प्रजा न केवल सुखी और समृद्ध थी, बल्कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाली थी। राज्य में कहीं भी द्वेष, ईर्ष्या या अन्याय का नामोनिशान नहीं था। हर व्यक्ति ईश्वर की भक्ति में लीन और अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान था।
किन्तु, इस अपार सुख और वैभव के बीच भी महाराज दशरथ के हृदय में एक गहरी पीड़ा थी—वे संतानहीन थे।
एक दिन प्रातःकाल जब वे अपने राजमहल में दर्पण के सामने खड़े होकर स्वयं को निहार रहे थे, तभी उनकी दृष्टि अपने काले, घने केशों के बीच झलकते एक श्वेत केश पर पड़ी। वह एक श्वेत केश मानो समय का संकेत लेकर आया था। उसे देखते ही राजा का हृदय भीतर तक विचलित हो उठा। उनके मन में विचारों का तूफान उमड़ पड़ा—“क्या मेरे यौवन के दिन अब समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं? क्या मैं बिना संतान के ही इस संसार से विदा हो जाऊँगा? मेरे वंश का क्या होगा? इस विशाल राज्य का उत्तराधिकारी कौन बनेगा?”
ये प्रश्न उनके अंतर्मन को मथने लगे। एक राजा के रूप में ही नहीं, बल्कि एक साधारण मनुष्य के रूप में भी उनका हृदय व्याकुल हो उठा। अंततः उन्होंने निश्चय किया कि अब वे पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ का सहारा लेंगे।
उन्होंने अपने कुलगुरु, महर्षि वशिष्ठ को सादर आमंत्रित किया और अत्यंत विनम्रता के साथ अपने मन की व्यथा उनके सामने प्रकट की। उन्होंने गुरु से प्रार्थना की कि वे उन्हें ऐसा मार्ग दिखाएं जिससे उनकी यह अभिलाषा पूर्ण हो सके।
महर्षि वशिष्ठ, जो त्रिकालदर्शी और महान तपस्वी थे, उन्होंने राजा के भावों को गंभीरता से सुना और कुछ क्षण ध्यानमग्न होकर बोले—
“हे राजन, आपकी यह इच्छा उचित और धर्मसम्मत है। संतान की प्राप्ति के लिए ‘पुत्रेष्टि यज्ञ’ अत्यंत फलदायी माना गया है। यदि आप विधिपूर्वक इस यज्ञ का अनुष्ठान करें, तो निस्संदेह आपकी मनोकामना पूर्ण होगी।”
गुरु के वचनों ने जैसे राजा दशरथ के हृदय में आशा का दीप जला दिया। उन्होंने तत्काल इस पवित्र यज्ञ की तैयारी का आदेश दिया। गुरु वशिष्ठ की सलाह के अनुसार अश्वमेध यज्ञ की भी व्यवस्था की जाने लगी। शीघ्र ही सरयू नदी के उत्तरी तट पर एक विशाल, भव्य और अत्यंत सुंदर यज्ञशाला का निर्माण आरंभ हुआ। चारों ओर वेद मंत्रों की ध्वनि गूंजने लगी, और पूरा वातावरण एक दिव्य आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा।
मंत्रियों और सेवकों को यज्ञ की समस्त व्यवस्थाओं का दायित्व सौंपा गया। राज्य में मानो एक नए उत्साह का संचार हो गया था।
इसके बाद महाराज दशरथ अपने महल में पहुंचे और अपनी तीनों रानियों—माता कौशल्या, माता कैकेयी और माता सुमित्रा—को यह शुभ समाचार सुनाया। उनके मुख से यह वचन सुनते ही तीनों रानियों के हृदय आनंद और आशा से भर उठे। उनके नेत्रों में प्रसन्नता की चमक थी और मन में एक नई आशा का संचार हो चुका था।
ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अयोध्या में एक नए युग के आगमन की तैयारी प्रारंभ हो चुकी है…
