Advertisement728 × 90

रमा एकादशी की कथा, एकादशी व्रत में क्या करें, क्या न करें-

रमा एकादशी की कथा, एकादशी व्रत में क्या करें, क्या न करें-

bhagavad-gita-2
अब आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा- हे जनार्दन! मुझ पर आपका स्नेह है, अत: कृपा करके बताइए कि कार्तिक के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है?

भगवान श्रीकृष्ण बोले- राजन् ! कार्तिक (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार आश्विन) के कृष्णपक्ष में ‘रमा’ नाम की परम कल्याणमयी एकादशी होती है. यह परम उत्तम है और बड़े-बड़े पापों को हरनेवाली है.

युधिष्ठिर ने भगवान से इस एकादशी की कथा और महात्म्य का वर्णन करने की विनती की तो श्रीकृष्ण ने उन्हें रमा एकादशी की यह महात्म्य कथा सुनाई.

पूर्वकाल में मुचुकुन्द नामक विख्यात राजा थे जो भगवान श्रीविष्णु के भक्त और सत्यनिष्ठ थे. उनके राज्य में सभी जन एकादशी का व्रत नियमपूर्वक करते थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अपने राज्य पर निष्कण्टक शासन करने वाले मुचकुंद के घर में नदियों में श्रेष्ठ ‘चन्द्रभागा’ नदी ने कन्या के रूप में जन्म लिया. चंद्रभागा परम सुंदरी और गुणवती थी.

वह कन्या अपने आचार-व्यवहार से सबको प्रसन्न रखने वाली थी. युवा होने पर राजा ने चन्द्रसेनकुमार शोभन के साथ चंद्रभागा का विवाह कर दिया. एक बार शोभन दशमी के दिन अपने ससुर के घर आए.

उसी दिन समूचे नगर में पूर्ववत् ढिंढ़ोरा पिटवाया गया कि एकादशी के दिन कोई भी भोजन न करे. शोभन के कानों में भी यह आवाज पहुंची. उसने अपनी प्रिय पत्नी चन्द्रभागा से पूछा- अब मुझे इस समय क्या करना चाहिए, यह बताओ.

चन्द्रभागा बोली- मेरे पिता के घर पर एकादशी के दिन मनुष्य तो क्या कोई पालतू पशु आदि भी भोजन नहीं कर सकते. प्राणनाथ! यदि आप भोजन करेंगे तो आपकी बड़ी निन्दा होगी. इस प्रकार मन में विचार करके अपने चित्त को दृढ़ कीजिये.

शोभन ने कहा- प्रिये! तुम्हारा कहना सत्य है. मैं भी उपवास करुँगा. दैव का जैसा विधान है, वैसा ही होगा.

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके शोभन ने व्रत के नियम का पालन किया किन्तु सूर्योदय होते-होते उनका प्राणान्त हो गया. मुचुकुन्द ने शोभन का राजोचित दाह संस्कार कराया. चन्द्रभागा पिता के ही घर पर रहने लगी.

हे नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर ! उधर शोभन इस व्रत के प्रभाव से मन्दराचल के शिखर पर बसे हुए परम रमणीय देवपुर को प्राप्त हुए. वहां शोभन द्वितीय कुबेर की भाँति शोभा पाने लगे.

एक बार राजा मुचुकुन्द के नगरवासी विख्यात ब्राह्मण सोमशर्मा तीर्थयात्रा के प्रसंग से घूमते हुए मन्दराचल पर्वत पर गये, जहां उन्हें शोभन दिखायी दिए. राजा के दामाद को पहचानकर वे उनके समीप गये.

शोभन भी उस समय सोमशर्मा को आया हुआ देखकर शीघ्र ही आसन से उठ खड़े हुए और उन्हें प्रणाम किया. फिर क्रमश अपने ससुर राजा मुचुकुन्द, प्रिय पत्नी चन्द्रभागा तथा समस्त नगर का कुशलक्षेम पूछा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.सोमशर्मा ने कहा- राजन्! वहां सब कुशल है. आश्चर्य है! ऐसा सुन्दर और विचित्र नगर तो कहीं किसी ने भी नहीं देखा होगा. बताओ तो सही, आपको इस नगर की प्राप्ति कैसे हुई?

शोभन बोले- कार्तिक कृष्णपक्ष में ‘रमा’ नाम की एकादशी होती है, उस व्रत के करने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई है. मैंने श्रद्धाहीन होकर इस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया था, इसलिए मैं ऐसा मानता हूँ कि यह नगर स्थायी नहीं है. आप चन्द्रभागा से यह सारा वृत्तान्त कहियेगा.

शोभन की बात सुनकर ब्राह्मण मुचुकुन्दपुर में गये और वहाँ चन्द्रभागा के सामने उन्होंने सारा वृत्तान्त कह सुनाया. सोमशर्मा बोले- शुभे! मैंने तुम्हारे पति को प्रत्यक्ष देखा. इन्द्रपुरी के समान उनके सुंदर नगर को भी देखा किन्तु वह नगर अस्थिर है. तुम उसे स्थिर बनाओ.

चन्द्रभागा ने कहा- मेरे मन में पति के दर्शन की लालसा लगी हुई है. आप मुझे वहाँ ले चलिये. मैं अपने व्रत के पुण्य से उस नगर को स्थिर बनाऊँगी.

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- हे राजन्! चन्द्रभागा की बात सुनकर सोमशर्मा उसे साथ ले मन्दराचल पर्वत के निकट वामदेव मुनि के आश्रम पर गये. वहाँ ॠषि के मंत्र की शक्ति तथा एकादशी सेवन के प्रभाव से चन्द्रभागा का शरीर दिव्य हो गया तथा उसने दिव्य गति प्राप्त कर ली.

इसके बाद वह पति के समीप गयी. अपनी प्रिय पत्नी को आया हुआ देखकर शोभन को बड़ी प्रसन्नता हुई. उन्होंने उसे बुलाकर अपने वाम भाग में सिंहासन पर बैठाया.

उसके बाद चन्द्रभागा ने अपने प्रियतम से कहा- नाथ! जब मैं आठ वर्ष से अधिक उम्र की हो गयी, तबसे लेकर आज तक मेरे द्वारा किये एकादशी व्रत से जो पुण्य संचित हुआ है, उसके प्रभाव से यह नगर कल्प के अन्त तक स्थिर रहेगा तथा सब प्रकार के मनोवांछित वैभव से समृद्धिशाली रहेगा.

नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार ‘रमा’ व्रत के प्रभाव से चन्द्रभागा दिव्य भोग, दिव्य रुप और दिव्य आभरणों से विभूषित हो अपने पति के साथ मन्दराचल के शिखर पर विहार करती है.

हे महाराज युधिष्ठिर! मैंने तुम्हारे समक्ष ‘रमा’ नामक एकादशी के महात्म्य का वर्णन किया है. यह एकादशी चिन्तामणि तथा कामधेनु के समान सब मनोरथों को पूर्ण करनेवाली है.

जो वैष्णवजन एकादशी का व्रत रखते हैं उन्हें व्रत से जुड़े कुछ विशेष नियमों का पालन करना चाहिए. इससे व्रत का पुण्य बढ़ जाता है. हम समय-समय पर ये बातें बताते रहते हैं. आप फिर से बताते हैं-हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एकादशी व्रत करने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को दशमी के दिन से कुछ अनिवार्य नियमों का पालन करना चाहिए.

-इस दिन मांस, प्याज, मसूर की दाल आदि निषेध वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए.

-रात्रि को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा भोग-विलास से दूर रहकर सात्विक आचरण करना चाहिए.

-एकादशी के दिन प्रात: लकड़ी का दातुन न करें. नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और उंगली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी ‍वर्जित है. अत: वृक्ष से स्वयं गिरे पत्ते सेवन करें. यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें.

फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर गीता पाठ करें या गीता पाठ का श्रवण करें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.-प्रभु के सामने इस प्रकार प्रण करना चाहिए कि आज मैं चोर, पाखंडी और दुराचारी मनुष्यों से बात नहीं करूंगा और न ही किसी का दिल दुखाऊंगा. रात्रि को जागरण कीर्तन करूँगा.

-‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादश मंत्र का यथासंभव जाप करें. श्रीराम, श्रीकृष्ण, नारायण आदि के मंत्रों और विष्णु सहस्रनाम का सस्वर पाठ करें.

-भगवान विष्णु का स्मरण कर प्रार्थना करें कि- हे त्रिलोकीनाथ! मेरी लाज आपके हाथ है, अत: मुझे इस प्रण को पूरा करने की शक्ति प्रदान करें.

-इस दिन यथा‍शक्ति दान करना चाहिए किंतु किसी का दिया हुआ अन्न आदि ग्रहण न करें. दशमी के साथ मिली हुई एकादशी वृद्ध मानी जाती है.

वैष्णवों को योग्य द्वादशी मिली हुई एकादशी का व्रत करना चाहिए. त्रयोदशी आने से पूर्व व्रत का पारण करें.

-व्रत के (दशमी, एकादशी और द्वादशी)- इन तीन दिनों में कांसे के बर्तन, मांस, प्याज, लहसुन, मसूर, उड़द, चने, कोदो (एक प्रकार का धान), शाक, शहद, तेल और अत्यम्बुपान (अधिक जल का सेवन)- सेवन न करें.

आप इस व्रत को तीन दिन का समझ सकते हैं. पहले दिन यानी दशमी को और तीसरे दिन यानी द्वादशी को दिन में सिर्फ एक बार भोजन करना होता है. भोजन में जौ, गेहूं, मूंग, सेंधा नमक, कालीमिर्च, शर्करा और गोघृत आदि का प्रयोग कर सकते हैं.

एकादशी को तो व्रत रहता ही है. जो फलाहार करते हैं उन्हें गोभी, गाजर, शलजम, पालक, कुलफा का साग इत्यादि सेवन नहीं करना चाहिए. आम, अंगूर, केला, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन कर सकते हैं.

जुआ, निद्रा, पान, परायी निन्दा, चुगली, चोरी, हिंसा, मैथुन, क्रोध तथा झूठ, कपटादि अन्य कुकर्मों से नितान्त दूर रहना चाहिए. बैल की पीठ पर सवारी न करें.

भूलवश किसी निन्दक से बात हो जाय तो इस दोष को दूर करने के लिए भगवान सूर्य के दर्शन तथा धूप दीप से श्रीहरि की पूजा कर क्षमा माँग लेनी चाहिए.

-एकादशी के दिन घर में झाडू नहीं लगायें, इससे चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है. इस दिन बाल नहीं कटाएं.

मधुर बोलें. अधिक न बोलें और सत्य ही बोलें. असत्य एकदम नहीं बोलना चाहिए. इस दिन यथाशक्ति अन्नदान करें. प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए.

एकादशी के दिन किसी सम्बन्धी की मृत्यु हो जाय तो उस दिन व्रत रखकर उसका फल संकल्प करके मृतक को देना चाहिए और श्रीगंगाजी में अस्थि प्रवाहित करने पर भी एकादशी व्रत रखकर व्रत फल प्राणी के निमित्त दे देना चाहिए.

प्राणिमात्र को अन्तर्यामी का अवतार समझकर किसीसे छल कपट नहीं करना चाहिए. अपना अपमान करने या कटु वचन बोलने वाले पर भूलकर भी क्रोध नहीं करें. मन में दया रखनी चाहिए.

इस विधि से व्रत करनेवाला उत्तम फल को प्राप्त करता है. द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को मिष्टान्न, दक्षिणादि से प्रसन्न कर उनकी परिक्रमा कर लेनी चाहिए.
आप सभी Maa Durga Laxmi Sharnam एप्पस जरूर डाउनलोड कर लें. माँ लक्ष्मी व माँ दुर्गा को समर्पित इस एप्प में दुर्लभ मन्त्र, चालीसा-स्तुति व कथाओं का संग्रह है. प्ले स्टोर से डाउनलोड कर लें या यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करें. विनती है कि कृपया एप्प की रेटिंग जरूर कर दें.

ये भी पढ़ें-
सुहागिनों के पर्व करवा चौथ की सरलतम शास्त्रीय विधि, व्रत कथा और पूजन-पारण का महूर्त
माता सीता ने क्या युद्ध में रावण के वंश के एक असुर का संहार भी किया था
जानिए विवाह का आठवां वचन क्या है?
पति को वश में रखने का द्रौपदी ने सत्यभामा को सिखाया तंत्र-मंत्र से ज़्यादा कारगर ये यंत्र-करवा चौथ स्पेशल

हम ऐसी कथाएँ देते रहते हैं. Facebook Page Like करने से ये कहानियां आप तक हमेशा पहुंचती रहेंगी और आपका आशीर्वाद भी हमें प्राप्त होगा: Please Like Prabhu Sharnam Facebook Page

धार्मिक चर्चा करने व भाग लेने के लिए कृपया प्रभु शरणम् Facebook Group Join करिए: Please Join Prabhu Sharnam Facebook Group

error: Content is protected !!