एक बड़े तालाब में सैकड़ों मेढक रहते थे. तालाब में कोई राजा नहीं था. इसलिए एक तरह से सारे मनमौजी थे, सारे ही राजा थे. कोई किसी की सुनता नहीं, जिसकी जो मर्जी चलती वही होता.

इस कारण दिन पर दिन अनुशासन हीनता बढ़ती जाती थी. स्थिति धीरे-धीरे नियंत्रण के बाहर होती गई क्योंकि व्यवस्था बनाने वाला कोई था ही नहीं. उसे ठीक करने का कोई यंत्र तंत्र मंत्र किसी को नहीं सूझता था.

नई पीढ़ी उत्तरदायित्व नहीं समझती थी. जो थोड़े बहुत होशियार मेढक निकलते थे वे दीन-दुनिया की बातें सीखकर अपना तालाब सुधारने की बजाय दूसरे तालाबों में चैन से जा बसते थे.

हारकर कुछ बूढ़े मेंढकों ने घोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया और उनसे आग्रह किया कि तालाब के लिए कोई राजा भेज दें जिससे उनके तालाब में सुख चैन स्थापित हो सके.

शिवजी ने नंदी को उनकी देखभाल के लिए भेज दिया. नंदी तालाब के किनारे इधर उधर घूमते, पहरेदारी करते लेकिन न वह उनकी भाषा समझते थे न उनकी जरूरतें. अलबत्ता उनके खुर से कुचलकर अकसर कोई न कोई मेढक मर जाता.

समस्या दूर होने की बजाय और बढ़ गई थी. पहले तो केवल झगड़े-झंझट होते थे लेकिन अब तो मौतें भी होने लगीं. फिर से कुछ बूढ़े मेंढकों ने तपस्या से शिवजी को प्रसन्न किया और राजा को बदल देने की प्रार्थना की.

शिवजी ने उनकी बात का सम्मान करते हुए नंदी को वापस बुला लिया और अपने गले के सर्प को राजा बनाकर भेज दिया. फिर क्या था सर्प पहरेदारी करते समय एक दो मेंढक चट कर जाता. मेंढक उसके भोजन जो थे.

मेढक बुरी तरह से परेशानी में घिर गए थे. फिर से मेढकों ने घबराकर तपस्या से भोलेशंकर को प्रसन्न किया और कहा कि आप कोई पशु पक्षीराज करने के लिये न भेजें कोई यंत्र या मंत्र दे दें जिससे तालाब में सुख शांति स्थापित हो सके.

शिव ने सर्प को वापस बुला लिया और उन्हें एक प्रतिनिधि शिला पकड़ा दी. मेंढकों ने जैसे ही शिला को तालाब के किनारे रखा वह उनके हाथ से छूट गई और बहुत से मेंढक दबकर मर गए.

मेंढकों की समस्याओं हल होना तो दूर उनके ऊपर मुसीबतों को पहाड़ टूट पड़ा फिर क्या था. तालाब में चीख पुकार रोना धोना मच गया. मेढक मिलकर फिर शिवजी की प्रार्थना में लग गए- हे भगवान, आपने ही यह मुसीबत हमें दी है, आप ही इसे दूर करें.

भोलेबाबा पिघल गए और शीघ्र प्रकट हो गए. मेंढकों ने कहा- आपका भेजा हुआ कोई भी राजा हमारे तालाब में व्यवस्था नहीं बना पाया. समझ में नहीं आता कि हमारे कष्ट कैसे दूर होंगे. कोई यंत्र या मंत्र काम नहीं करता. आप ही बताएं हम क्या करें?

शिवजी हंसे. फिर बोले- यंत्र मंत्र छोड़ो और स्वतंत्र स्थापित करो. मैं तुम्हें यही शिक्षा देना चाहता था. तुम्हें क्या चाहिए और तुम्हारे लिए क्या उपयोगी वह केवल तुम्हीं अच्छी तरह समझ सकते हो.

किसी भी तंत्र में बाहर से भेजा गया कोई भी बाहरी शासन या नियम चाहे वह कितना ही अच्छा क्यों न हो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं हो सकता. इसलिए अपना स्वाभिमान जागृत करो, संगठित बनो, अपना तंत्र बनाओ और उसे लागू करो.

अपनी आवश्यकताएं समझो. गलतियों से सीखो. माँगने से सबकुछ प्राप्त नहीं होता. अपने परिश्रम का मूल्य समझो और समझदारी से अपना तंत्र विकसित करो.

यह दंत कथा है, दंत कथाएं किसी संदेश को सरलता से हृदय तक पहुंचाने के लिए रची जाती हैं. कितना कुछ है इसमें सीखने को. हर चीज के लिए पराश्रित होने का भाव आपकी सृजनशक्ति को समाप्त कर देता है, प्रतिभा को कुचल देता है.

यह तो पैर पर कुल्हाड़ी मारना नहीं बल्कि कुल्हाड़ी पर जाकर पैर मारने जैसी बात हो गई. ईश्वर उनकी सहायता को सदा तैयार होते हैं, जो अपनी सहायता के लिए कदम बढ़ाते हैं.

संकलनः शिवानी शर्मा
संपादनः राजन प्रकाश

यह कथा शिवानी शर्मा ने जम्मू से भेजी. शिवानीजी संस्कृत की शोध छात्रा हैं और आध्यात्मिक चर्चा में गहरी रूचि रखती हैं.

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