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लेकिन सब देव मिलकर भी सदाशिव के आधे बल को संभाल नहीं पा रहे थे. तब शिवजी ने स्वयं त्रिपुरासुर का संहार करने का संकल्प लिया. सभी देवताओं ने अपना आधा बल महादेव को समर्पित किया.
त्रिपुरासरों के वध के लिए तीन कठिन शर्तें थीं- अविजित रथ, असंभव अस्त्र और अभिजित मुहूर्त में तीनों पुरों को एक पंक्ति में खड़ा करना था. अविजित रथ के लिए पृथ्वी रथ बनीं, सूर्य और चन्द्रमा उसके पहिए तथा ब्रह्मदेव सारथी बने.
असंभव अस्त्र के लिए भगवान श्रीविष्णु बाण बने, मेरु पर्वत धनुष और वासुकी उस धनुष की डोर बने. भोलेनाथ रथ पर सवार हुए, तब सभी देवताओं द्वारा सम्हाला हुआ वह रथ भी डगमगाने लगा. विष्णुजी बैल बनकर स्वयं रथ में जुत गए तब जाकर रथ संभला.
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Jai Tripurari Prabhu Sada Shiv ki
आपके शुभ वचनों के लिए हृदय से कोटि-कोटि आभार.
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