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जो लोग राजकुमारी का उपहास करते थे वे अब उससे विवाह को लालायित रहने लगे. राजकुमारी को आभास था कि ये सब उसके सौंदर्य पर मुग्ध है, हृदय से कोई लगाव नहीं. उसने विवाह से साफ मना कर दिया और कठिन तप में लग गई.
उसने एक साल तक की कठोर तपस्या के बाद भगवान शंकर प्रकट हुए और वर देने को कहा. कुमारी ने कहा- यदि आप प्रसन्न हैं तो इस तीर्थ में आपका वास हो. भगवान शंकर ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली.
वहां के शिव ‘बर्करेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध हुए. यह बात सब जगह फैल गई तो नागों का राजा स्वस्तिक पाताल लोक से कुमारी को देखने स्तम्भ तीर्थ आया.
स्वास्तिक भगवान् शंकर के स्थान के करीब जहां धरती फोड़ कर बाहर निकला था, वहां उसके आने से बने कूप को उसके नाम पर स्वस्तिक कुआं रख दिया गया, इसमें हमेशा गंगा जल भरा रहता है.
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भगवान शंकर से वर पाने में सफल हो कुमारी अपने माता-पिता के पास सिंहलद्वीप लौट आई. राजा शतश्रृंग अपनी कन्या की बातों को सुनकर चकित रह गए. शतश्रृंग ने देश को नौ भागों में बांट दिया.
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