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गणेशजी ने तुलसी से कहा कि वृक्ष रूप में तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय हो जाओगी.

पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा होगी. जिस पूजा संस्कार में तुम्हारा प्रयोग नहीं होगा वह पूजा अधूरी रहेगी लेकिन मेरे पूजन में तुम्हारा प्रयोग वर्जित होगा.

गणेशजी के शाप के कारण तुलसी का विवाह असुरराज जलंधर से हुआ. जलंधर दरअसल शिवजी का ही अंश था.

शिवजी ने एक बार इंद्र की परीक्षा लेने के लिए अवधूत का रूप धरा लेकिन इंद्र पहचान नहीं पाए और उनपर वज्र से प्रहार कर दिया.

शिवजी ने इंद्र को भस्म करने के लिए अपने ललाट से विशाल अग्निपुंज पैदा किया लेकिन ब्रह्मा आदि देवताओं ने प्रार्थनाकर उनका क्रोध शांत किया. शिवजी ने उस अग्निपुंज को समुद्र में फेंक दिया.

सिंधु से मिलते ही वह अग्निपुंज ने एक शरीर धारण कर लिया. सिंधु ने उसका लालन-पालन किया. वह सिंधुपुत्र असुरराज जलंधर बना जिससे तुलसी का विवाह हुआ. तुलसी के शाप से गणेश की दो पत्नियाँ ऋद्धि और सिद्धि हुईं.

उधर तुलसी का पति जलंधर असीमित शक्तियों का स्वामी बनकर अत्याचार करने लगा. वह शिवजी का अंश था. ब्रह्मा से उसने वरदान हासिल किया था. इसलिए रक्षा के लिए देवताओं ने शिवजी से प्रार्थना की.

बह्रमाजी ने तुलसी को भी वरदान दिया था कि उसके पति को तब तक कोई हरा नहीं पाएगा जब तक उसका पतिव्रत अखंड रहेगा. शिवजी और जलंधर का हजार साल तक युद्ध हुआ लेकिन तुलसी के सतीत्व के कारण उसे हराना संभव नहीं था.

देवताओं ने विष्णुजी से उपाय निकालने को कहा. आखिरकार विष्णुजी तुलसी का सतीत्व भंग करने को तैयार हुए.

वह अपने दो अनुचरों जय-विजय के साथ तुलसी के महल पहुंचे. जय-विजय ने ब्राह्मण का वेश लिया था और जाकर तुलसी को कहा कि जलंधर का वध हो गया है.

उन दोनों ने जलंधर का कटा हुआ सिर भी दिखाया लेकिन तुलसी को विश्वास नहीं हुआ. तभी विष्णुजी जलंधर का वेश बनाकर तुलसी के पास पहुंचे.

पति के मौत की खबर से निराश तुलसी अचानक पति को देखकर इतनी खुश हो गई कि उसने जांच की जरूरत नहीं समझी. उसने जलंधर वेशधारी विष्णुजी को गले लगा लिया.

तुलसी का पतिव्रत भंग हो गया था. शिवजी ने जलंधर का वध कर दिया. अब तुलसी को पता चल गया कि यह उसका पति नहीं. तुलसी के कहने पर भगवान अपने रूप में आए.

तुलसी ने उन्हें शाप दे दिया कि जैसे मुझे पति वियोग हुआ है आपको भी मानव अवतार लेना पड़ेगा और पत्नी वियोग सहना पड़ेगा.

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