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मेरी जैसी योग्य कन्या से विवाह का प्रस्ताव कोई कैसे ठुकरा सकता है, वृंदा का गर्व उसकी बुद्धि को ग्रसने लगा. गणेशजी ने तो शांत होकर अपनी विवशता बताई थी पर रूप के गर्व मे चूर वृंदा ने उसका तात्पर्य गलत लिया.

वंदा क्रोध से तिलमिलाने लगीं. उसने गणेशजी को फिर कहा कि आप मुझसे विवाह करें अन्यथा मैं आपको श्राप दे दूंगी.

गणेशजी ने अनसुना कर दिया तो वृंदा ने श्राप दिया- तुम्हें अपने ब्रह्मचारी होने का बड़ा मान है. तुम मुझ जैसी रूपवती और गुणी कन्या को ठुकरा रहे हो. मैं तुम्हें शाप देती हूं कि तुम्हारे एक नहीं दो-दो विवाह होंगे.

गणेशजी ने सुना तो आवाक रह गए. वृंदा ने उन्हें अकारण शाप दिया था. इससे उन्हें क्रोध आया. उन्होंने भी तुलसी को श्राप दिया.

गणेशजी बोले- तुम्हें अपने रूप और गुण पर बड़ा मान है. तुम कामोत्तेजित हो, विवाह के लिए इतनी लालायित हो. तुम पर असुर गुण हावी हुआ और अकारण मुझे शाप दिया. इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुम्हारा विवाह असुर से होगा.

तुम्हें जिस सुंदर शरीर पर इतना अभिमान है वह समाप्त हो जाएगा और तुम एक दिन वृक्ष बन जाओगी.

असुर से विवाह और वृक्ष बन जाने की शाप सुनकर वृंदा रोने लगीं. वह गणेशजी के पैरों पर गिरकर क्षमा मांगने लगीं. वृंदा के बार-बार याचना पर गणपति का क्रोध शांत हुआ.

गणेशजी बोले- मैं शाप को वापस तो नहीं लौटा सकता लेकिन शाप में ऐसा संशोधन कर सकता हूं कि यह शाप वरदान सिद्ध हो जाएगा. शाप भी तुम्हारे लिए आनंददायी हो जाएगा.

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