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महात्माजी बोले- बेटा जब तुम आए थे तब तुम्हारे साथ अहंकार का बोझ था. अब तो चोला तुमने उतार दिया है तुम इंसान बन गए हो. हम ऐसे सद्गुणों का आदर करते हैं. साधु मान-अपमान से ऊपर होता है. उसे तो सदगुण प्रिय हैं.

राजा नतमस्तक हो गया. कितनी बड़ी बात कही महात्माजी ने. हम अनावश्यक जीवन में लोगों के उपकार का बोझ लेते रहते हैं. हम समझते हैं कि यह कोई कार्य थोड़े ही था. यकीन मानिए हर उपकार एक बोझ जैसा ही होता है जिसे कभी न कभी चुकाना ही होगा.

किसी दीन-दुखी या सचमुच किसी जरूरतमंद को देखें तो आगे बढ़कर सहायता का भाव रखें. संभव है आपको कुछ पुराने अनुभव बुरे रहे हों पर न जाने किस अनुभव के लिए ईश्वर समय आ गए हो परीक्षा के लिए.

धर्म में आस्था रखें. धर्मकार्यों में आस्था रखें. किसी अन्य धर्म का अनादर करना, उसकी अवहेलना करना धर्म नहीं. सनातन तो जीवन जीने की आदर्श कला है. वसुधैव कुटुंबकम्.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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