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प्रभु विश्राम कर रहे थे. उसने प्रभु के चरणों के दर्शन करना चाहा लेकिन शेषनाग ने रोक दिया.

कछुआ विनती करता रहा लेकिन शेष ने एक न सुनी. बेचारे के बिना श्रीहरि के चरणों के दर्शन हुए ही प्राण निकल गए. कछुए की तपस्या अधूरी रह गई.

अगले जन्म में वह कछुआ केवट बना. प्रभु ने श्रीराम अवतार लिया. शेषनाग लक्ष्मण रूप में और माता लक्ष्मी सीता रूप में आईँ.

प्रभु को नदी पार करनी थी. केवट नदी पार कराने आया. केवट का तप अधूरा रहा था- उसने शर्त रखी कि प्रभु आप पैर धुलवाएंगे तभी नाव में सवारी मिलेगी.

उसने उलाहना दिया- कहीं मेरी नाव भी अहिल्या की तरह नारी बन गई तो परिवार कैसे पालूंगा.

शेषनाग और लक्ष्मीजी के सामने ही केवट ने प्रभु के चरण कमलों को पखारने का सुख प्राप्त किया.
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