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गरुड उनकी बहादुरी और दूसरे की प्राणरक्षा के लिए स्वयं का बलिदान देने की हिम्मत से बहुत प्रभावित हुए. उन्हें स्वयं पर पछतावा होने लगा.

वह सोचने लगे कि एक यह मनुष्य है जो दूसरे के पुत्र की रक्षा के लिए स्वयं की बलि दे रहा है और एक मैं हूं जो देवों के संरक्षण में हूं किंतू दूसरों की संतान की बलि ले रहा हूं. उन्होंने जीमूतवाहन को मुक्त कर दिया.

गरूड ने कहा- हे उत्तम मनुष्य में तुम्हारी भावना और त्याग से बहुत प्रसन्न हूं. मैंने तुम्हारे शरीर पर जो घाव किए हैं उसे ठीक कर देता हूं. तुम अपनी प्रसन्नता के लिए मुझसे कोई वरदान मांग लो.

राजा जीमूतवाहन ने कहा- हे पक्षीराज आप तो सर्वसमर्थ हैं. यदि आप प्रसन्न हैं और वरदान देना चाहते हैं तो आप सर्पों को अपना आहार बनाना छोड़ दें. आपने अब तक जितने भी प्राण लिए हैं उन्हें जीवन प्रदान करें.

गरुड ने सबको जीवनदान दे दिया तथा नागों की बलि न लेने का वरदान भी दिया. इस प्रकार जीमूतवाहन के साहस से नाग-जाति की रक्षा हुई.

गरूड़ ने कहा- तुम्हारी जैसी इच्छा वैसा ही होगा. हे राजा! जो स्त्री तुम्हारे इस बलिदान की कथा सुनेगी और विधिपूर्वक व्रत का पालन करेगी उसकी संतान मृत्यु के मुख से भी निकल आएगी.

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