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पितृ पक्ष आने पर जोगे की पत्नी ने उससे पितरों का श्राद्ध करने के लिए कहा तो जोगे इसे व्यर्थ का कार्य समझकर टालने की चेष्टा करने लगा, किंतु उसकी पत्नी समझती थी कि यदि ऐसा नहीं करेंगे तो लोग बातें बनाएंगे.
फिर उसे अपने मायके वालों को दावत पर बुलाने और अपनी शान दिखाने का यह उचित अवसर लगा. अतः वह बोली- आप शायद मेरी परेशानी की वजह से ऐसा कह रहे हैं, किंतु इसमें मुझे कोई परेशानी नहीं होगी. मैं भोगे की पत्नी को बुला लूंगी. दोनों मिलकर सारा काम कर लेंगी.
फिर उसने जोगे को अपने पीहर न्यौता देने के लिए भेज दिया. दूसरे दिन उसके बुलाने पर भोगे की पत्नी सुबह-सवेरे आकर काम में जुट गई. उसने रसोई तैयार की. अनेक पकवान बनाए फिर सभी काम निपटाकर अपने घर आ गई. आखिर उसे भी तो पितरों का श्राद्ध-तर्पण करना था.
इस अवसर पर न जोगे की पत्नी ने उसे रोका, न वह रुकी. शीघ्र ही दोपहर हो गई. पितर भूमि पर उतरे. जोगे-भोगे के पितर पहले जोगे के यहां गए तो क्या देखते हैं कि उसके ससुराल वाले वहां भोजन पर जुटे हुए हैं. निराश होकर वे भोगे के यहां गए.
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