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वह बोला- मां जगदंबा की पूजा मेरे लिये जीवन और सब बातों से बढ कर है. मैं उसमें किसी भी तरह की कमी बर्दाश्त नहीं कर सकता. अब मैंने अगर ऐसा कह दिया तो देखना मैं तेरा विवाह किसी निर्धन कुष्ठ रोगी से ही करुंगा.
क्षमा मांगने के उपरांत भी पिता ऐसे शाप दे रहे हैं. यह बात सुमति को अंदर तक तोड़ गई.
इस पर सुमति ने अनाथ से कहा- आपकी कन्या होने के नाते मैं हर तरह से आपके अधीन हूँ. आप जिससे चाहें मेरा ब्याह कर सकते हैं, किन्तु होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा होगा. आप उसको नहीं बदल सकते.
भूल करने के बाद बहस भी कर रही है. यह सोचकर अनाथ का क्रोध और बढ़ गया.
उसने वहीं पर प्रण कर लिया कि अब सुमति को दंड देकर ही मानूंगा. उसका विवाह दरिद्र कुष्ठ रोगी से ही होगा.
कुछ बरस बाद उसने ढूंढकर सुमति का ब्याह एक दरिद्र कुष्ठ रोगी से कर दिया.
सुमति ने इसे भाग्य का लेखा मानकर स्वीकार लिया. दरिद्र शादी कर के अपनी पत्नी को लेकर जाता भी कहाँ इसलिये सुमति और उसके पति ने विदायी के बाद वह रात जंगल में बड़े दुःख तकलीफ से गुजारी.
वह रात अत्यंत पीड़ा में बीती. उसकी पीड़ा देखकर मां अंबे वहां प्रकट हो गयीं. असल में अनाथ के साथ सुमति ने भी मां जगदंबे की बहुत दिनों तक मन लगा कर पूजा की थी इसलिये उसके उसकी ऐसी दशा देख भगवती प्रकट हुई थी.
मां अंबे ने उससे कहा, कि हे दीन ब्राह्मणी, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ, जो माँगना हो मांग ले.
माता सुमति के समक्ष थीं. उसे इस बात का विश्वास ही न होता था. प्रसन्नता के मारे तो उसकी बुद्धि काम ही नहीं कर रही थी.
भावावेश में उसने माता से प्रश्न कर दिया-हे मां मुझ दीन-हीन पर आपने ऐसी कृपा कैसे की? मेरे ऐसे कौन से पुण्य हैं माता जिससे मुझ पर ऐसा अनुग्रह हुआ?
अपनी भक्त के इस प्रश्न पर मां हंस पड़ीं. देवी मां ने बताया- पुत्री मैं ही आदिशक्ति माँ हूँ, ब्रह्मा, विद्या और सरस्वती भी हूँ. इस जन्म में तुमने अपने किशोरावस्था के दौरान सच्चे मन से जो मेरी पूजा की और साथ ही तेरे पिछले जन्म के कर्म भी बहुत अच्छे थे, इसलिए मैंने तुझे दर्शन दिए.
पिछले जन्म में तू एक केवट की पतिव्रता औऱ धर्मनिष्ठ पत्नी थी. तुम सदा मेरी भक्तिभाव में रहती और नित्य पूजा करती.
एक दिन तेरे पति ने चोरी की और उसे राजा के सिपाहियों ने पकड़ लिया. तुम दोनों को जेलखाने में बंद कर दिया गया.
सिपाहियों ने वहां तुम दोनों को खाने को कुछ भी न दिया. उन दिनों नवरात्र चल रहे थे.
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