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मैं संसार के सारे आईने तोड़ दूंगा! मैं सुंदर हूं, और ये आईने मुझे कुरूप करते हैं! मनुष्य भी उस पागल की तरह व्यवहार करता रहा है. आईना वही छवि दिखाता है जो सही है। आईना वही बताता है, जो मैं हूं.
आईने के पास कोई कारण नहीं कि वह किसी को कुरूप कर दे. बजाय अपनी वास्तविक छवि को देखकर स्वीकार करने के हम आईने तोड़ने में लगे हैं.
जो लोग संसार को छोड़कर भाग जाने को उतारू लोग हैं वे और कोई नहीं आईने को तोड़ने वाले लोग हैं. अगर संसार दुखद मालूम पड़ता है तो याद रखें कि संसार एक दर्पण से ज्यादा नहीं. वही दिखायी पड़ता है, जो हम हैं.
जब हम सुख के जीवन में होते हैं तो उन्माद में और उमंग में मस्त रहते हैं. लगता है कि संसार में सब ओर सुख है. किसी के कष्टों में सहानुभूति नहीं रखते. अपने उन्माद में दूसरों को पीड़ा पहुंचाते हैं और उसके लिए कोई न कोई खोखला तर्क भी खोज लेते हैं.
समय तो करवट लेगा ही. जिन खोखले तर्कों की आड़ में आप संसार के साथ जैसा व्यवहार कर रहे थे, वही तर्क इस बार दूसरे इस्तेमाल कर रहे होते हैं तो आपको सब बिखरता हुआ लगता है.
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