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जल्दी ही जलंधर ने इंद्र के नंदन कानन तक में अपनी सेना उतार दी. देवता भी मुकाबले के लिए आकर डटे. दोनों पक्षों के आचार्य अपने-अपने पक्ष के वीरों को जीवित करने लगे. जलंधर क्रोधित हुआ कि जब मृत संजीवनी विद्या सिर्फ शुक्राचार्य के पास है तो देवता कैसे जीवित हो जाते हैं.

शुक्राचार्य ने बताया कि देवगुरू बृहस्पति द्रोणागिरी से औषधि लेकर देवों को जीवित कर देते हैं. इससे जलंधर बहुत क्रुद्ध हो गया. शुक्राचार्य ने कहा- क्रोधित न हो यदि शक्ति है तो द्रोणागिरी को उखाड़कर समुद्र में फेंक दो.
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