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इस बार रामनारायण ने देवी को प्रणाम करके कहा, ‘‘आप के शाप से मेरी दो बड़ी इच्छाएँ पूरी हो गईं और साथ ही किसानों का भला भी हो गया.’’
चण्डमुखी खुश होने की बजाये नराज हो गईं, ‘‘मूर्ख! तुम मुझे उकसाने आये हो? इस साल तुम जहां जहां घूमने टहलने को पैदल चलोगे तुम्हारे क़द के बराबर गड्ढा बन जाएगा.’’
रामनारायण समझ गया कि वहां से हिल नहीं सकता है. सवेरा होने तक वह उसी मंदिर में बैठा रहा. सवेरा होते ही एक राहगीर के जरिये राजा के पास ख़बर भेज पालकी मँगवाकर उसमें बैठ राजा के पास गया. राजा को अपने शाप के बारे में और उससे लाभ लेने की योजना बताई.
रामनारायण की योजना थी कि राज्य भर में जहां जहां नहरें खुदवानी थीं, उनको नाप कर निशान बना दिया जाये.फिर वह उनसे होकर पैदल चलता जाएगा तो उसके पीछे अपने आप गहरी नहरें बन जाएँगी.
योजना सफल रही, रामनारायण जब नहर नहीं बना रहा होता तो पालकी में चलता और बढिया जगहों पर टिकता सोने चांदी के बरतनों में खूब तर माल उड़ाता.
बिना मेहनत मजदूरी के सस्ते में नहरें बन गईं. नयी उपजाऊ जमीन मिली तो राज्य मालामाल हुआ.
तीसरे साल आया तो रामनारायण फिर शहर चला और चण्डमुखी मंदिर मन्दिर में जा कर ठहर गया, पहले की ही तरह आधी रात को देवी आईं तो रामनारायण ने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘आप के शाप अद्भुत हैं. मुझे और जनता दोनों को बड़ा लाभ हुआ.
रामनारायण की बात पर देवी और गुस्सा हो गयी और फिर शाप देते हुए बोलीं, मूर्ख! मेरे शाप देने के बावजूद तू दूसरी बार मंदिर में आया और अब तीसरी बार भी अब मैं देखूँगी कि इस बार मेरा शाप तुम्हे कैसे फलता है.
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