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जरूर कोई ऐसी शक्ति है जो मुझसे ज्यादा समर्थवान है.

मानव शरीर ने सोचा- भले ही वह शक्ति अदृश्य है लेकिन अलौकिक है. रोम-रोम में है और सर्वशक्तिमान है. ऐसा विचार आते ही उसने महसूस किया कि परमात्मा को देख लिया है. इस जगत का कर्ता-धर्ता ईश्वर हैं.

अब ब्रह्मा संतुष्ट हो गए और उन्होंने मनुष्य को अपना जीवन आगे बढ़ाने के लिए छोड़ा फिर अन्य कार्यों में लग गए.

सोचिए अगर कुछ मंत्र बोल देने, या देख लेने, छू लेने, सूंघ लेने से मनुष्य का पेट भर जाता तो संसार वहीं ठप्प हो जाता. ब्रह्मा का उद्देश्य कहां पूरा होता. (वेद की कथा)

परमात्मा को जानने और उसे प्राप्त करने का सौभाग्य सिर्फ मानव शरीर को मिला है. परमात्मा की इस कृति का सदुपयोग उनका नाम जपकर हो सकता है. प्रभु शरणम् की मूल विचारधारा यही है.

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