peepal-poojan

एक समय वाराणसी नगरी में धनेश्वर नाम का एक वैश्य रहता था. वह पूजा पाठ और ब्राह्मणों की सेवा करने में बहुत रुचि रखता था. उसका एक बेटा भी था.

नगर के प्रमुख स्थान पर उसकी एक दूकान थी जिससे वह आजीविका कमाता था. दूकान में एक स्थान पर एक सर्पिणी ने अंडा दिया और वह उस अंडे को छोडकर कहीं चली गयी.

वैश्य बड़ा दयालु था. अंडे को देखा तो उसे अपने स्थान से हटाने की बजाये उसे बचाने का ऐसे उपाय कर दिया कि अंड़े को कोई छेड़े नहीं. वह उसकी रक्षा करने लगा.

कुछ ही दिन बीते थे कि अंडे को फोड़कर काले नाग का चमकीला सा बच्चा बाहर निकला. उस सर्प की मां तो थी नहीं, वैश्य ने उस पालने की जिम्मेदारी ले ली. वह हर दिन सांप को दूध पिलाता था.

थोड़ा बड़ा हुआ तो वह सर्प भी वैश्य से बहुत हिल-मिल गया. वह वैश्य के पैरों पर लोटता और पूरे घर में निर्भय हो घूमता रहता. वैश्य भी सर्प की रक्षा करता.

एक बार की बात है, धनेश्वर हर दिन की तरह गंगा स्नान करने के लिये गया था और उसका पुत्र दुकान पर बैठकर ग्राहकों को सामान बेच रहा था.

उसी समय वह सांप उस लडके के पैरों के बीच से निकला. सर्प विकसित होकर बड़ा भयंकर स्वरूप का बन चुका था. वैश्य का लड़का सांप के अचानक आ जाने से बुरी तरह डर गया.

उसने बिन कुछ सोचे बिचारे पास रखा डंडा सर्प को दे मारा. डंडे की पूरी चोट चपल सर्प को तो लगी नहीं. थोड़ी सी चोट खाकर वह उछल कर वैश्यपुत्र के सिर पर सवार हो गया.

सर्प क्रोधित होकर बोला- मूर्ख! तुम्हारे पिता ने ही मेरा पालन-पोषण किया है, मैं तुम्हारे पिता की शरण में हूं, इसलिए मैं तुम्हारा भी भला ही चाहता था परन्तु तुमने मुझे अकारण मारा है. अब तो मैं तुम्हें जीवित नही छोडूंगा.

अब तक घर के सब लोग इकट्ठा हो चुके थे, यह देख सुनकर सब दु:खी हो रोने लगे. उसी समय गंगा स्नान कर वह धनेश्वर भी घर आ गया. उसने सर्प से पूछा- पन्नग! तुम मेरे बेटे के सर पर फन फैलाये क्यों बैठे हो? सर्प ने फुफकार भरा.

धनेश्वर बोला- सच कहते हैं कि मूर्ख मित्र के साथ सम्बन्ध करना अपने हाथ से जलता हुआ अंगारा उठाने जैसा है. तुम प्राणियों में उस जाति के हो जिसके चरित्र में ही खोट बतायी गई है.

वैश्य की बात अनसुनी कर सांप बोला– धनेश्वर! तुम्हारे पुत्र ने मुझे निरपराध ही मारा है. इसलिए तुम्हारे सामने ही मैं इसके प्राण लूंगा जिससे यह उदाहरण बने और आगे कोई भी व्यक्ति ऐसा काम न करे.

यह सुनकर धनेश्वर ने कहा– सर्प ! जो कोई उपकार, भक्ति तथा स्नेह को भूलकर रास्ते से भटक जाए उस कृतघ्न को कौन रोक सकता हैं पर अब इतनी कृपा करो कि तुम इस बालक को थोड़ी देर के लिए छोड़ दो.

मैं अपने पुत्र के हाथों ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपना संस्कार कर्म अपने ही हाथ से कर लूं क्योंकि बाद में मेरे पास कोई पुत्र नहीं रहेगा जो मेरे मरने के बाद यह सब करे.

सर्प ने इस बात को स्वीकार कर लिया पर इस बात पर अड़ा रहा कि वह वैश्य पुत्र को डसेगा अवश्य. वह वैश्य पुत्र के मस्तक पर ही विराजमान रहा.

वैश्य ने उसी दिन एक हजार दिग्गज विद्वान ब्राह्मणों तथा सिद्ध सन्यासियों आदि को निमंत्रित कर अत्यंत मधुर स्वादिष्ट भोजन कराया. भोजन और ब्राह्मणों के अन्य सेवा कर्म में वैश्य के पुत्र ने भी बड़ी तत्परता दिखायी.

भोजन और सेवा से संतुष्ट हो ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर कहा- हे वैश्यपुत्र, तुम चिरंजीवी हो. तुम्हारे सभी शत्रु नष्ट हो जाए. तुम्हारा सकल मनोरथ सिद्ध हो जाए.

सिद्ध योगियों का वचन निष्फल कैसे जा सकता था. सन्यासियों के वचन सर्प को वज्र से लगे और वह वैश्य पुत्र के मस्तक से गिरकर तत्काल मर गया.

सर्प को मरा देखकर धनेश्वर बड़ा दुःखी हुआ, सोचने लगा कि मैंने इस संप को अपने बेटे की ही तरह पाला था. आज मैं ही इसकी मौत का कारण बना. यह तो बहुत बुरा हुआ.

यदि सर्प दोषी था तो मेरा बेटा भी, मैंने भी अंतत: उपकार का मार्ग त्यागकर स्वार्थ की ही राह पकड़ी. वह तो सर्प था परंतु मैंने मनुष्य होकर यह किया. इस प्रकार से पछताते हुए वैश्य ने न तो उस दिन भोजन किया, न ही रात में सो सका.

भोर होते ही धनेश्वर गंगा स्नान कर, देवता-पितरों का पूजन-तर्पण किया और घर आकर एक बार फिर से एक हजार श्रेष्ठ ब्राह्मणों सन्यासियों को न्योता दिया.

इस बार तो धनेश्वर और भी उत्तम व्यंजनों का भोजन कराकर ब्राह्मणों को संतुष्ट किया. भरपेट सुस्वादु भोजन के बाद ब्राह्मणों ने कहा– धनेश्वर! हम लोग तुमसे बहुत ही प्रसन्न हैं इसलिये अब तुम वर मांगो.

वैष्य ने कहा हे विप्रवरों आप को यदि मुझे वर देना है तो बस यह कीजिए कि मृत सर्प फिर जीवित हो जाये. इसके बाद वैश्य ब्राह्मणों को वहां ले गया जहां मृत सर्प पड़ा था.

ब्राह्मणों ने मंत्र पढ कर जल सर्प के ऊपर छिड़का. जल के शीतल छीटे पड़ते ही वह सर्प जीवित हो गया. यह देखकर धनेश्वर बड़ा ही प्रसन्न हुआ.

पूरी वाराणसी नगरी में धनेश्वर की दयालुता का यह प्रसंग सुना जाने लगा और नगर के लोग धनेश्वर की प्रशंसा करने लगे. जो व्यक्ति अपने आश्रितों पर दया रखता है, अतिथियों को अन्न दान देता है, वह संसार के समस्य सुख भोगकर विष्णु लोक को प्राप्त कर लेता है.

(स्रोत: भविष्यपुराण, उत्तरपर्व का अठ्ठाइसवां अध्याय)

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश

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