[sc:fb]

अपने शरीर से आत्मा को निकालकर एक मृत गृहस्थ के शरीर में पहुंचाया और फिर स्त्री देह का ज्ञान लेकर वापस अपने शरीर में लौट गए. इसके बाद उन्होंने भारती देवी के सभी प्रश्नों के उत्तर दिए. पति-पत्नी दोनों उनके शिष्य बन गए.

सनातन धर्म के प्रचार के लिए शंकराचार्य ने अनेक स्थानों का भ्रमण किया। इन्होंने काशी, कुरुक्षेत्र, बद्रिकाश्रम में अन्य मतों के प्रचारकों से एवं विद्वानों से शास्त्रार्थ किया.

इनके प्रभाव से पुन: सनातन धर्म की ओर लोगों की रुचि होने लगी। इन्होंने अनेक मंदिर भी बनवाए। पूरे भारत की यात्रा करने के पश्चात देश के चारो दिशाओं में एक-एक पीठ स्थापित किए.

पूर्व में पुरीधाम में गोवर्धन मठ, पश्चिम में द्वारकाधाम में शारदा मठ, उत्तर के योतिर्धाम में ज्योतिर्मठ व दक्षिण के रामेश्वरम धाम में श्रृंगेरी मठ के नाम से विख्यात है.

इन्होंने दो सौ ग्रंथों की रचना की है जिसमें ब्रह्मसूत्र भाष्य, गीता भाष्य, विवेक चूड़ामणि, उपनिषद भाष्य, प्रबोध सुधाकर, उपदेश साहसी, अपरोक्षानुति, सौन्दर्य लहरी व प्रपंचसार तंत्रम आदि प्रमुख हैं.

बत्तीस वर्ष की अवस्था में इन्होंने सनातन पंरपरा के गौरव को पुनःस्थापित कर लिया और फिर ब्रह्मलीन हो गए.

आदि शंकराचार्य जी ने जो कार्य किए हैं उसके लिए सभी सनातनी आजीवन ऋणी और श्रद्धाभाव से नतमस्तक रहेंगे. उन्होंने सनातन के ज्ञान को लिपिबद्ध किया. उसका प्रचार किया. उनके द्वारा लिखे भाष्य को आधार बनाकर उसके बाद के संतों ने प्रचार किया तो सनातन का गौरव पुनः स्थापित हुआ.

संभवतः सनातन के नामलेवा आज न होते यदि शिव ने शंकराचार्य के रूप में अवतार न लिया होता.

भगवान आदि शंकराचार्य की जयंती पर उन्हें शत्-शत् नमन.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

प्रभु शरणम् की सारी कहानियां Android व iOS मोबाइल एप्प पे पब्लिश होती है। इनस्टॉल करने के लिए लिंक को क्लिक करें:
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें

फेसबुक पेज लाइक करें-
[sc:fb]

ये भी पढ़ें-
बच्चों के सामने ईश्वर को कोसकर अपने बच्चे का कितना नुकसान किया कोई अंदाजा है!

पराया धन ढेला समानः सुंदर गुणों के विकास के लिए उपमन्यु की कथा बच्चों को सुनाएं

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here