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शंकराचार्य एक दिन गंगा की ओर जा रहे थे. सामने से एक चांडाल चार कुत्तों के साथ नशे में धुत आता दिखाई दिया. चांडाल ने पूरा रास्ता धेर लिया था.
उसका स्पर्श न हो जाए इस आशंका से शंकराचार्य ने कहा- रास्ते के एक तरफ होकर चलो औऱ मुझे मार्ग दो. मेरे जाने का स्थान तो छोड़ दो.
चांडाल ने चलते-चलते कहा- कौन किसको स्पर्श करता है? सर्वत्र एक ही वस्तु व्यापत है. किसके भय से तुम दबकर चल रहे हो? आत्मा किसी को स्पर्श नहीं करती. जो आत्मा तुममें है वही मुझमें है फिर तुम दूर जाने को किसे कह रहे हो, इस शरीर को या आत्मा को?
कहते हैं स्वयं भगवान विश्वनाथजी चांडाल रूप धरकर आए थे उन्हें सिद्धांत पर अड़े न रहकर जनमत को साथ लेकर धर्म की स्थापना का कार्य करने का आदेश देने.
शंकराचार्य का जीवन उसी पल बदल गया. प्रमुख शिष्यों के साथ बद्रिकाश्रम चले गए औऱ ब्रह्मसूत्र पर प्रसिद्ध भाष्य लिखा. इसके बाद ग्यारह प्रमुख उपनिषदों पर प्रसिद्ध शारीरिक भाष्य भी लिखा.
शंकराचार्यजी ने बौद्ध, जैन आदि अवैदिक मतों द्वारा सनातन पर हो रहे प्रहार का जोरदार जवाब देते हुए जनमानस को तैयार करना शुरू किया.
कुमारिल भट्ट उनके पास मिलने आए और उन्हें इस कार्य में सहयोग का भरोसा दिया और कहा मुझसे भी विद्वान मेरा शिष्य मंडन मिश्र है. उससे मिलो और वैदिक धर्म का उद्धार करो. यह कहकर उन्होंने शरीर त्याग दिया.
अवैदिक धर्मों के खिलाफ मोर्चा खोलने से उनपर कई बार जानलेवा हमले हए. देश की यात्रा शुरू की और मंडन मिश्र से भी मिले. मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया तो उनकी पत्नी भारती ने शंकराचार्य को चुनौती दी.
भारती ने उनसे कामशास्त्र और स्त्रीशरीर के रहस्यों से जुड़े प्रश्न पूछने आरंभ किए.
बालब्रह्मचारी शंकराचार्य को स्त्रीदेह का ज्ञान ही न था. उस समय उन्होंने ऐसा कार्य किया जो देवताओं और हमारे आदि ऋषिण कर किया करते थे.
शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया.
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