[sc:fb]
शंकराचार्यजी की बचपन की एक और चमत्कारिक घटना बड़ी प्रसिद्ध है.
बालक शंकर गुरुजी के आश्रम में रहकर अध्ययन करते थे. एक बार बरसात में अचानक बाढ़ का पानी चढने लगा.
ऐसा लगा कि पानी आश्रम को लील ही जाएगा. गुरूजी बड़े चिंतित थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए.
बालक शंकर ने गुरू को व्याकुल देखा तो बाढ़ को रोकने का निश्चय किया. अपने कमंडल में बाढ़ के पानी को समाहित कर लिया और पानी वहां से लुप्त हो गया.
काशी में रहकर शंकराचार्य वैदिक धर्म के उत्थान कार्य में जुट गए. इन्हें एक दिन गंगा के किनाने सामान्य ब्राह्मण के रूप में वेदव्यासजी ने दर्शन दिए.
वेदव्यास ने शंकर से ब्रह्मसूत्र का अर्थ पूछा. शंकराचार्य ने बताकर संतुष्ट किया. भगवान वेद-व्यासजी के साथ उनका आठ दिनों तक शास्त्रार्थ चला.
अंत में वेदव्यास ने अपना परिचय देकर इन्हें पूर्ण आशीर्वाद दिया और अद्वैतवाद का प्रचार करने का आदेश दिए और साथ इनकी उम्र 16 वर्ष से 32 वर्ष होने का आशीर्वाद भी दिया.
शंकराचार्य निर्गुण सिद्धांत के अनुयायी थे. संसार की मिथ्या और माया को समझने का भाव उनके अंदर इतना प्रबल हो चुका था कि वह सगुण उपासना की तरफ ध्यान ही न देते थे. उस समय सनातन में सगुण उपासना ही प्रचलित थी.
शंकराचार्य कहा करते- मैं सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से रहित हूं. मैं शरीर, इंद्रिय, प्राण और अंतःकरण की क्रिया से रहित हूं.
आकार से रहित हूं, अविद्या रूपी मल से रहित हूं. आकाशतत्व के समान सभी प्राणियों में व्याप्त हूं. देश काल और वस्तु से रहित जो परब्रह्म है वही मैं हूं.
वह गुरू की आज्ञा से लोगों को वेदांत का उपदेश तो दे रहे थे किंतु हृदय से तो वह संसार को असत् समझ रहे थे. उनका कार्य हृदय से नहीं बस यंत्रवत हो गया था.
उन्हें इस भाव से निकालने के लिए एक दैवीय चमत्कार हुआ.
शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.